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पुलिस सुधार पैकेज के स्थान पर उसके स्वरूप पर ध्यान दें / पुलिस सुधार पैकेज के स्थान पर उसके स्वरूप पर ध्यान दें

यह धन हथियारों और उपकरणों पर ही खर्च होगा या पुलिस की आंतरिक संरचना में बदलाव के लिए भी।

Sep 29, 2017, 06:43 AM IST
पुलिस सुधार के लिए राज्यों को 25,000 करोड़ रुपए का पैकेज देने का केंद्र का एलान स्वागत योग्य है लेकिन, देखना है कि यह धन हथियारों और उपकरणों पर ही खर्च होगा या पुलिस की आंतरिक संरचना में बदलाव के लिए भी। इस पैकेज की तकरीबन आधी राशि यानी 10,132 करोड़ रुपए तो जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर के राज्यों और माओवादी आतंकवाद से पीड़ित राज्यों पर खर्च होगी, जो वहां हो रहे केंद्रीय सुरक्षा बलों पर व्यय के अतिरिक्त होगा। इसी तरह इसमें से 3000 करोड़ रुपए माओवादी जिलों के विकास के लिए रखे गए हैं। सरकार का कहना है कि यह देश में पुलिस सुधार पर घोषित अब तक की सबसे बड़ी राशि है, लेकिन, इसमें केंद्र का योगदान 75 प्रतिशत है और बाकी योगदान राज्यों को करना होगा। प्रधानमंत्री पुलिस को चुस्त दुरुस्त, आधुनिक और स्मार्ट देखना चाहते हैं और उनकी इच्छा मुनासिब है। इसी के साथ उन्हें उस लक्ष्य पर भी ध्यान देना चाहिए, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में प्रकाश सिंह बनाम केंद्र सरकार के फैसले में निर्धारित किया था। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि पुलिस के कामों में राज्य सरकारों की दखलंदाजी और विशेषकर राजनीतिक दखलंदाजी बंद होनी चाहिए। इसीलिए राज्य सुरक्षा आयोग के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग का गठन किया जाना चाहिए और डीजीपी की नियुक्ति पक्षपात के आधार पर नहीं योग्यता के आधार पर होनी चाहिए। उसका कार्यकाल कम से कम दो साल का होना चाहिए और एसपी के साथ थानेदार का कार्यकाल भी दो साल से कम का नहीं होना चाहिए। विडंबना है कि फैसले के 11 साल बाद भी शायद ही किसी राज्य ने इस दिशानिर्देश का एक-चौथाई हिस्सा भी लागू किया हो। जैसे संसद से कानून पारित होने के बावजूद लोकपाल का गठन लटका हुआ है उसी प्रकार कोर्ट के आदेश के बावजूद पुलिस सुधार का काम भी लंबित है। सरकार और उसे चलाने वाली पार्टियों की रुचि इस बात में होती है कि पुलिस उनके इशारे पर नाचे। काडर आधारित दलों को इसका विशेष मोह होता है ताकि उनके कार्यकर्ता सरकार में हुए बिना अपनी सरकार चलाते रहें। सवाल उठता है कि पुलिस की प्रशासनिक संरचना में बदलाव के बिना 1961 के अंग्रेजी पुलिस अधिनियम के आधार पर हम कब तक आज़ाद भारत की पुलिस को चलाएंगे। अगर संरचना में बदलाव किए बिना यह धन खर्च किया गया तो उसके व्यर्थ जाने की भी आशंका बनती है।
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