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त्यागपत्र एक पाखंड, बर्खास्त करने की हिम्मत दिखाइए

8 वर्ष पहले
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‘त्याग के अनुपात में लाभ बंटता है।’
- अर्थशास्त्र
‘त्यागपत्र के अनुपात में नुकसान बंटता है।’
- राजनीतिशास्त्र
त्यागपत्र मांगना कमजोर नेतृत्व का प्रतीक है। और दैत्याकार आक्रोश व हंगामे के कई दिन बाद यदि कोई त्यागपत्र दे दे तब तो नेतृत्व की योग्यता पर ही प्रश्न उठने लगते हैं। स्पष्ट है : यदि किसी एक को लेकर (यहां दो पढ़ें) सभी त्रस्त हो रहे हों, यदि विवाद बढ़ता जा रहा हो, यदि संदेह गहरा रहा हो, यदि भरोसा टूटता जा रहा हो और यदि समूची व्यवस्था पर ही आंच आ रही हो तो बर्खास्त करने की हिम्मत दिखानी होगी। तभी नेतृत्व करने का अधिकार है।
रेलमंत्री पवन बंसल से इस्तीफा मांगने में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को लंबा समय लग गया। कानून मंत्री अश्वनी कुमार से तो इस्तीफा मांगने का नैतिक साहस भी संगठन और सरकार नहीं जुटा पा रहे थे। जबकि दोनों के दोष एकदम साफ हैं। ओपन एंड शट केस। और संयोग ही है कि दोनों केंद्रीय मंत्रियों के दोषों को उजागर किया है सीबीआई ने! उसी सीबीआई ने, जिसे कुछ ही दिन पहले ‘कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन’ कहकर नवाज़ा गया था। उसी सीबीआई ने जिसे स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने ‘पिंजरे में कैद तोता’ कहा है, जिसके कई मालिक हैं।
बस, एक अंतर है। बंसल के काले कारोबारी कारनामे वाले भतीजों-भान्जों को सीबीआई ने छापे मारकर बेनकाब किया। जबकि अश्वनी कुमार ने कोयले की रिपोर्ट को संपादक की तरह जांचने, काटने और नए सिरे से लिखने का जो उत्साह दिखाया, उसे सीबीआई ने शपथ पत्र बनाकर उजागर किया। ‘संपादक की तरह’ कुछ करना हमेशा खतरे से भरा होता है। पता नहीं ‘एंगल’ बदलने से कल क्या हो जाए? किन्तु यहां उन्हें कोई खतरा नहीं लग रहा था।
क्योंकि उन्हें अपनी वकालत के लंबे अनुभव से यह भांपने में कोई परेशानी नहीं हुई होगी कि नेतृत्व उनका कुछ नहीं कर सकता। बल्कि ऐसा ‘अनैतिक’ करके तो वे प्रधानमंत्री की सहायता कर रहे हैं! कौन कर सकता है उन्हें बर्खास्त? और किस मुंह से? प्रधानमंत्री, कोयला मंत्री भी थे। उन्हीं के कार्यकाल में सारा घोटाला हुआ। एक अन्य मंत्री सुबोधकांत सहाय के भाई का नाम भी आया था। प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर सहाय ने कोयला खदान मांगी थी।
चौबीस घंटे से भी पहले प्रधानमंत्री ने कोयला मंत्रालय को आदेश दे दिया था कि आवंटन करो। जिस पर देश के इतिहास में सर्वाधिक ‘धीमी गति’ के प्रधानमंत्री होने का आरोप लगाया जाता हो, उनकी अपने मंत्री को कोयला ब्लॉक देने में ऐसी गति, स्तब्ध कर देने वाली ही तो है। भारी विवाद उठने पर सहाय ने भी त्यागपत्र दिया। उन्हें बर्खास्त करने का दायित्व कहां से पूरा करते डॉ. मनमोहन सिंह?
दायित्व निभाने के लिए भीतरी ताकत चाहिए। बड़े दायित्व निभाने के लिए और भी बड़ा साहस चाहिए। हर तरह का। शारीरिक। मानसिक। नैतिक। और प्रधानमंत्री हों या यूपीए, कांग्रेस (या कोई भी पार्टी) के अध्यक्ष हों तो नैतिक भी, राजनैतिक भी। यह भारतीय राजनीति का सर्वाधिक विकृत रूप है। पं. जवाहरलाल नेहरू के समय से चल रहा है। मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी - कोई भी हो- सारे ग़ैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी दोषी मंत्रियों को निर्ममता से बर्खास्त करने में बचते रहे हैं। ये तो फिर कांग्रेसी ठहरे!
एक नए तरह का कुरूप षड्यंत्र शुरू हुआ है सत्ता और नौकरशाही में। जब पाप का घड़ा भरने लगे तो फूटने से पहले बहा दो! ताज़ा मामले में बहुत ही सुनियोजित ढंग से एक समाचार ‘लीक’ किया गया। बल्कि दो भागों में। तीन समाचार। पहले कहा गया ‘सत्ता के सूत्र बता रहे हैं कि पवन बंसल का इस्तीफा हो सकता है। अश्वनी कुमार का नहीं।’ फिर सूझ-बूझ भरे अंतराल में दूसरा समाचार प्लांट हुआ। ‘बंसल हटेंगे, अश्वनी का मंत्रालय बदलेगा।’ इसके बाद, नहीं, इन समाचारों से ठीक पहले एक खबर ‘चलाई’ गई। ‘सोनिया गांधी नाराज़ हैं कि मनमोहन इन मंत्रियों को हटा क्यों नहीं रहे!! खूब प्रचारित हुई यह खबर। चूंकि प्रभावी और प्रतिष्ठित सूत्रों, एजेंसियों, सूचना तंत्रों, समाचार चैनलों और शक्तिशाली माध्यमों से जारी की गई थी, इसलिए छपना स्वाभाविक था। खूब छपी। हर जगह चली। चारों ओर दिखाई-पढ़ाई गई। अमेरिका की कम बदनाम किन्तु अधिक भ्रष्ट राजनीति में इसे ‘इन्सपायर्ड लीक’ कहते हैं। जानबूझकर बताई गई खबर। बनाई गई भी कह सकते हैं! धोखा देने के इरादे से गढ़ी जाती हैं ऐसी खबरें। अविश्वास का कोई कारण नहीं। सभी धोखा खा जाते हैं, सफलतापूर्वक।
इतने रोष, इतने तीखे, चुभते आरोपों और अपयश के बावज़ूद कल तक समूची कांग्रेस बंसलों-अश्वनी कुमारों की बंधक बनी दिख रही थी। बड़े-बड़े नेता टीवी चैनलों पर ऐसे तथ्य-तर्क दे रहे थे मानो सुप्रीम कोर्ट में उन दोषी मंत्रियों की पैरवी कर रहे हों। तब कांग्रेसाध्यक्ष नाराज़ नहीं थीं? संसद-सांसद गूंज रहे थे। तब कांग्रेसाध्यक्ष नाराज़ नहीं थीं? सुप्रीम कोर्ट लगातार तोते के मालिकों को फटकार लगा रहा था- तब कहीं-कोई रोष नहीं था? अब अचानक क्या हुआ? स्पष्ट है ‘सत्ता के दो केंद्र’ वाली नीति काम में लाई गई। पहले बचाओ। फिर बदनामी-परेशानी का पिंजरा कसने लगे तो ‘नाराज़गी’ जाहिर कर, दोष प्रधानमंत्री पर मढ़ दो!
नई किन्तु डरावनी है यह चाल। वैसे, नई इतनी भी नहीं है। नरेंद्र मोदी की दंगों में भूमिका को लेकर उठे ज्वलनशील आरोपों के बाद उदारवाद का अटल चेहरा, मुखौटे में परिवर्तित होने की आंच में कुछ झुलसने लगा तो ऐसी ही रणनीति बनी थी। इन्सपायर्ड लीक। ‘उच्च पदस्थ सूत्रों’ ने बताया था कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बहुत ‘आहत’ हैं। मोदी ने राजधर्म नहीं निभाया इसलिए। खूब प्रचारित हुआ था। राजधर्म नहीं निभाया तो आप आहत क्यों होते हैं- राजदंड उठाइए। और दंड दीजिए। किन्तु वही, भीतर की ताकत चाहिए। वाजपेयी जैसे विशाल व्यक्तित्व के लिए ऐसा कहना उचित नहीं लगता। किन्तु सच भी तो यही है। दूर क्यों जाएं। जिस कर्नाटक में भाजपा बुरी तरह हारी है- वहां भी ऐसा ही प्रचार था। येदियुरप्पा, मोदी से भी चौड़ा ‘५६ इंच जैसा’ सीना ताने भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी से मिलकर लौटे थे। ‘इस्तीफे का सवाल ही नहीं,’ कहा था। बर्खास्तगी में देरी की तो आज पार्टी ही बर्खास्त हो गई।
राजनीतिक नेतृत्व में ऐसा भीतरी साहस हो कि निर्ममता से दोषियों को बर्खास्त कर सकें, यह असंभव है। किन्तु करना ही होगा। नेतृत्व का अर्थ ही साहस है। और सर्वाधिक घृणित लगता है जब त्यागपत्र देने वाले दोषी कहते हैं : नैतिकता (!) के नाते दिया। कैसी नैतिकता? ये वो राजनीतिक पीढ़ी है जो लालबहादुर शास्त्री के त्यागपत्र को ऐसे देखती है मानों उनसे कोई ‘भूल हो गई हो!’ रेल दुर्घटना पर रेलमंत्री के त्यागपत्र का समय, महान् परम्पराओं का समय था। अब तो रेलवे की हर पोस्टिंग, हर प्रमोशन के लिए बोली लगाने-बेचने वाले नेता-नातेदारों का समय है। इसे रोकना ही होगा। और उसके लिए जो शीर्ष पर हैं, उन्हें पहल करनी होगी। हमें करवानी होगी।
वैसे डॉ. मनमोहन सिंह चाहें तो यहां भी ‘नाइट ऑफ लॉन्ग नाइव्ज़’ यानी ‘लंबे खंजरों की रात’ के नायक बन सकते हैं। यह शीर्षक ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेरल्ड मैकमिलन द्वारा 13 जुलाई 1962 को सात मंत्रियों को एक साथ बर्खास्त करने पर बना था। जो कालांतर में विश्व राजनीति में चर्चित हुआ। वहां भी ऐसी ही परिस्थितियां थीं। उन्हें बेबस कहा जा रहा था। और वे थे भी।
त्यागपत्र ‘देने’ का पाखंड बंद करवाना होगा। त्यागपत्र में झूठे ‘त्याग’ की बू है जबकि बर्खास्तगी में साहस की खुशबू।
(लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)
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