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जनता से जुड़ाव का मौजूदा दौर

7 वर्ष पहले
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राहुल गांधी शहर-दर-शहर जाकर विभिन्न वर्गों के लोगों के साथ उनकी मांगों पर चर्चा कर रहे हैं। उनका वादा है कि इन अपेक्षाओं की झलक कांग्रेस के चुनाव घोषणा-पत्र में मिलेगी। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने 'चाय पर चर्चा' का व्यापक कार्यक्रम बनाया है। योजना के मुताबिक नरेंद्र मोदी समेत पार्टी के बड़े नेता 300 लोकसभा क्षेत्रों में 1000 चाय की दुकानों पर जाएंगे और आमजन से राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा करेंगे। तकरीबन दो घंटों के इस कार्यक्रम के दौरान ये नेता चुनाव क्षेत्र की खास समस्याएं सुनेंगे एवं नीतिगत मामलों पर विचार-विमर्श करेंगे। इन चर्चाओं के लाइव प्रसारण एवं वेबकास्टिंग का इरादा है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी मोहल्ला सभाओं के आयोजन की पहले ही शुरुआत कर चुकी है। यह रुझान महत्वपूर्ण है। जिस दौर में चुनाव अभियान बड़ी रैलियों, टेलीविजन और सोशल मीडिया पर आश्रित हो गया था और नेताओं तथा राजनीतिक दलों के जनता से कटते जाने की शिकायत आम थी, अब नेताओं का सीधे आमजन के बीच जाना ताजा हवा के झोंके जैसा अहसास है। इस बीच कांग्रेस का 15 लोकसभा क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं के निर्वाचक मंडल से उम्मीदवारों का चयन करवाने का फैसला भी अभिनव पहल है। यह आगे बढ़ा तो आलाकमान को सर्वशक्तिमान मानने की संस्कृति पर यह सीधा प्रहार होगा, जिसमें अधिकांश पार्टियां फंसी हुई हैं। इससे नए लोगों के राजनीति में आने तथा स्वच्छ छवि के नेताओं/कार्यकर्ताओं के आगे बढऩे का रास्ता तैयार होगा। कहा जा सकता है कि सिविल सोसायटी के हाल के संघर्षों, मीडिया के अभियान तथा जागरूक जनमत के दबाव का आखिरकार राजनीतिक दलों पर असर हो रहा है। जन-आकांक्षाओं के प्रति अधिक संवेदनशीलता दिखाने को वे विवश हो रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इससे भारतीय लोकतंत्र अपने विकासक्रम के नए स्तर पर पहुंचेगा। यह लोकतंत्र की मूल भावना में निहित है कि राजनीतिक व्यवस्था में विधि सम्मत जन-भावना प्रतिबिंबित हो और लोग राजकाज में सक्रिय हस्तक्षेप करते रहें। संकेत है कि जनतंत्र के प्रातिनिधिक स्वरूप को स्थिर एवं टिकाऊ बनाने के बाद अब भारत उसी दिशा में बढ़ रहा है। राजनीति में निरंतर जन सहभागिता की संस्कृति अगर स्थायी हो जाती है, तो संवैधानिक आदर्शों को प्राप्त करने की दिशा में यह बड़ी प्रगति होगी।