ट्राई के फैसले से फेसबुक की फ्री बेसिक्स योजना पर पानी फिरने से कंपनी के अमेरिका स्थित बोर्ड डायरेक्टर मार्क एंड्रीसन बौखला गए। उन्होंने ट्वीट करके कहा कि इंटरनेट टैरिफ को लेकर भारत सरकार का फैसला सही नहीं है और भारत अगर ब्रिटिश शासन के अधीन होता तो इसकी हालत बेहतर होती। इसके पहले फेसबुक के संस्थापक मार्क ज़करबर्ग ने भी पोस्ट लिख कर येन-केन प्रकारेण भारतीय बाजार पर कब्जे का संकल्प दोहराकर भारत के कानून और सार्वभौमिकता को चुनौती दी थी।
अाखिर मुफ्त की सेवा देने के लिए फेसबुक इतना बेचैन क्यों है? दरअसल, फेसबुक द्वारा वॉट्स अप को खरीदने के बाद भारत में 13 करोड़ फेसबुक यूज़र्स और 10 करोड़ वॉट्स अप यूज़र्स मिलकर फेसबुक को दुनिया का सबसे बड़ा बाजार देते हैं। इसे बढ़ाकर फेसबुक दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी बनने का सपना देख रही है। एंड्रीसन फेसबुक कंपनी में बड़े निवेशक हैं, जो अपना सपना टूटने की भड़ास निकाल रहे हैं।
ऑक्सफैम की रिपोर्ट से स्प्ष्ट है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा 509 लाख करोड़ से अधिक का पैसा आयरलैंड एवं अन्य टैक्स हैवन देशों में जमा किया गया है। भारत में वर्ष 2014 में कंपनी कानून में संशोधन के बावजूद फेसबुक द्वारा टैक्स रिटर्न के कानून का पालन नहीं किया जा रहा है। फेसबुक द्वारा लाभ का दो फीसदी पैसा सीएसआर के तहत सामाजिक कार्यों में खर्च करने की बजाय आम जनता को गुमराह करने वाले विज्ञापन दिए जा रहे हैं।
फेसबुक की रिपोर्ट के अनुसार 7-8 फीसदी फेसबुक यूज़र्स फर्जी हैं, जबकि इंडस्ट्री का अनुमान है कि यह संख्या 30 फीसदी तक हो सकती है। ऐसे गुमनाम यूज़र्स फेसबुक का इस्तेमाल अपराध, ड्रग्स बिक्री, रेव पार्टी, महिला उत्पीड़न, चाइल्ड सेक्स एवं आतंकवाद के लिए करते हैं। इनसे निपटने के लिए फेसबुक ने शिकायत अधिकारी की नियुक्ति आयरलैंंड में की गई है।
फेसबुक द्वारा अपने यूज़र्स के डाटा को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने के अलावा सामरिक सूचनाओं को भी अमेरिकी खुफिया एजेंसियों से साझा करने के प्रमाण मिले हैं, जिनकी पुष्टि स्नोडेन के खुलासे से हुई है। ऐसी कंपनियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई में भारत सरकार की विफलता से ही एंड्रीसन जैसे लोग जो मन में आए वह बोल रहे हैं। फेसबुक द्वारा फ्री बेसिक्स के लिए बताए जा रहे 38 देशों में जाम्बिया, घाना, बोलिविया जैसे पिछड़े देश हैं, जिनके साथ भारत की गिनती होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया कार्यक्रमों का मजाक ही बनता है।
दूसरी ओर चीन ने फेसबुक के लिए दरवाजे नहीं खोले हैं, क्योंकि अफीम युद्ध झेल चुका चीन पश्चिमी साम्राज्यवाद के खतरों की भारत से बेहतर समझ रखता है। ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह फेसबुक नव-साम्राज्यवाद का अमेरिकी चेहरा है। अवमानना के मुद्दों पर बहस करने वाले नेताओं व भारत सरकार के अपमान पर खामोशी निश्चित ही निराशाजनक है परन्तु भारतीय जनता ने देशव्यापी विरोध कर फेसबुक के साम्राज्यवाद पर करारा प्रहार तो कर ही दिया है।