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देश के आर्थिक हित में है महिला-पुरुष फर्क मिटाना

वर्ल्ड इकोनॉमिकफोरम द्वारा जारी किए गए महिला-पुरुष अंतर के आंकड़े विचलित करने वाले हैं।

निशा जांगिड़ | Last Modified - Nov 11, 2017, 06:53 AM IST

देश के आर्थिक हित में है महिला-पुरुष फर्क मिटाना
वर्ल्ड इकोनॉमिकफोरम द्वारा जारी किए गए महिला-पुरुष अंतर के आंकड़े विचलित करने वाले हैं। फोरम के अनुसार पहली बार वैश्विक स्तर पर महिला पुरुष के मध्य असमानता बढ़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक लैंगिक स्तर पर समानता लाने में अभी सौ वर्ष लगेंगे। आधी आबादी से भेदभाव चिंतन का विषय है।

इस इंडेक्स में भारत की रैंकिंग भी पिछले साल की तुलना में 21 स्थान नीचे गिरकर 144 राष्ट्रों में 108 वें स्थान पर पहुंच गई है। हालांकि इस वर्ष भारत में महिलाओं के सामाजिक उत्थान की दिशा में न्यायपालिका ने ठोस निर्णय लिए हैं। महिला अधिकार विरोधी तीन तलाक प्रथा को असंवैधानिक करार देकर हमारी न्यायव्यवस्था ने मुस्लिम महिलाओं के आत्मसम्मान में बढ़ोतरी की। इसके साथ ही वैवाहिक दुष्कर्म को आपराधिक कृत्य घोषित करके देश की न्यायपालिका ने जेंडर गैप को मिटाने का प्रयास किया है। फोर्ब्स की 100 प्रभावशाली महिलाओं की सूची में पांच भारतीय होना भी सुखद है। लेकिन, इन सब के बावजूद हमारी कार्यपालिका की अनिच्छा से देश में महिलाओं को पुरुषों के बराबर स्वतंत्रता नहीं मिल पाई है। महिला आरक्षण विधेयक को संसद में लंबित रखना भी सरकार के ढुलमुल रवैये का ही नतीजा है। देश की आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी काफी कम है। महज़ 13.76 फीसदी उद्यमों की बागडोर ही महिलाओं के पास है।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम द्वारा तय किए गए स्वास्थ्य, राजनीति, आर्थिक और शिक्षा के मानकों पर हम महिलाओं को पुरुषों के आसपास भी नहीं ला पाए हैं। कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराध मातृ मृत्यु दर की नाकामी से हम आज भी निजात नहीं पा सके हैं। उच्च शिक्षा में केवल 6.7 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी हमारी व्यवस्था के प्रति एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती है। उल्लेखनीय है कि आज भी देश की अर्थव्यवस्था के मुख्य आधार कृषिकार्य की सफलता महिला कार्यबल निर्धारित करता है। एक रिपोर्ट के अनुसार यदि भारत में लैंगिक समानता स्थापित हो जाती है तो देश के सकल घरेलू उत्पाद में अगले 35 वर्षों में 700 अरब डॉलर की वृद्धि हो सकती है।
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