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..तो जीवन दिव्य-पुष्प बन जाएगा

9 वर्ष पहले
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विश्वास और अभ्यास के ऊपर सब कुछ आधारित है। कुएं में पानी निकालने की क्रिया में रस्सी पत्थर से लगातार रगड़ खाती है। रसरी आवत जात ते सिल पर पड़त निशान।
रस्सी से जब पत्थर पर निशान बन सकते हैं, तो पत्थर से अधिक तो हम लोग जड़मति नहीं हैं। तय कर लें कि, बार-बार चिंतन करूंगा, अभ्यास करूंगा और निश्चित सब समझ में आ जाएगा। साधना का फल एक दिन में नहीं मिल सकेगा। नियमित रूप से दस मिनट भी साधना में बैठते रहें, तो निश्चित रूप से दस मिनट का महत्व मालूम हो जाएगा।
यह आश्वासन स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि देते हैं। वे समझाते हैं- अभ्यास से संतुलन हमारे भीतर आएगा। घटनाएं प्रभावित नहीं कर सकेंगी। व्यक्तियों से बातचीत करते समय आपको नारायण स्वरूप लगेगा और अमर्यादित व्यवहार नहीं होगा। जब हम इतने उदार होंगे, तो आपके आसपास रहने वाले परस्पर आत्मीयता के सूत्र में बंधेंगे। सिद्धांत है, महावाक्य है- ‘सिया राम मय सब जग जानी’ सम्पूर्ण जगत सीता और राममय हो जाएगा। थोड़ा समय नियमित रूप से साधना के लिए अवश्य निकालें।
सब कुछ भगवान का है, परंतु हम एकाधिकारवादी हैं। जब नहीं था, तब परमात्मा से प्रार्थना करते थे और जब उन्होंने कृपा कर मानव तन दे दिया तो कहते हैं- मेरा है। परमात्मा को देने से वह लेता नहीं है, वैसे ही प्रसन्न हो जाता है। संसार के लोग तो देने के लिए छोड़ते नहीं। इसलिए भावात्मक समर्पण, क्रियात्मक भगवान का स्मरण और कुछ क्षणों तक उनसे ऐक्य स्थापित किया जाए,तो हमारा जीवन परमात्मा की बगिया का सौरभ प्रदान करने वाला दिव्य-पुष्प बन जाएगा।