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कैमरन की यात्रा के निहितार्थ

9 वर्ष पहले
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‘यह ब्रिटिश इतिहास में अत्यंत शर्मनाक घटना थी, और उचित ही है कि विंस्टन चर्चिल ने उसे सरासर गलत बताया था।’- ये शब्द ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने अमृतसर में जलियांवाला बाग शहीद स्मारक पर श्रद्धांजलि देने के बाद कहे।
उन्होंने सैकड़ों निहत्थे भारतीय स्वंतत्रता सेनानियों के कत्लेआम की उस घटना के लिए सीधे माफी तो नहीं मांगी, लेकिन वहां जाकर उस अकथनीय अत्याचार के लिए एक तरह से प्रायश्चित जरूर किया। जलियांवाला बाग नरसंहार के समय जीवित बच गए एक व्यक्ति के उत्तराधिकारी ने कहा- ‘वे यहां आए, श्रद्धांजलि दी। यह माफी मांगने से कुछ ज्यादा ही है।’
यानी कैमरन अपने लिए भारत में अच्छी भावनाएं पैदा करके गए हैं। यही उनका मकसद भी था। उनकी नजर भारतीय बाजार और निवेशकों पर थी, जिनके सहारे वे ब्रिटेन को मौजूदा आर्थिक संकट से निकालना चाहते हैं। तो उन्होंने ऐसी बातें खूब कहीं, जो भारतीय कानों को अच्छी लगें। उनके दल की तरफ से ध्यान दिलाया गया कि प्रधानमंत्री बनने के बाद कैमरन यूरोप के बाहर अपनी पहली यात्रा पर भारत ही आए थे। इस बार वे उतना बड़ा प्रतिनिधिमंडल लेकर आए, जितना इतिहास में कभी किसी ब्रिटिश प्रधानमंत्री के साथ विदेश यात्रा पर नहीं गया। मुंबई में भारतीय पूंजीपतियों के साथ बैठक में कैमरन ने एलान किया कि भारतीय व्यापारी जिस रोज वीजा के लिए अर्जी देंगे, ब्रिटेन उसी रोज उसे जारी करेगा।
ब्रिटेन जाकर पढ़ने की इच्छा रखने वाले भारतीय छात्रों के रास्ते से रुकावटें हटाने की घोषणा भी उन्होंने की। ब्रिटेन का आकलन है कि भारत की तकरीबन 40 फीसदी आबादी मध्य वर्ग की श्रेणी में आने वाली है, जिससे यहां व्यापार के असीमित अवसर पैदा होंगे। कैमरन ने कहा कि यह सदी भारत की कथा है। ब्रिटेन इसमें भागीदार बनना चाहता है। बहरहाल, अपना ठोस एजेंडा उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने रखा। कहा कि भारत को वित्तीय सेवाओं को विदेशी निवेश के लिए खोल देना चाहिए, ताकि दोनों देशों में आपसी निवेश बढ़े।
शिक्षा एवं कौशल निर्माण के क्षेत्र में सहयोग पर उनका खास जोर था। इन व्यापारिक मकसदों में वास्तव में कितनी सफलता उन्हें मिली, अभी इसका आकलन होना है। लेकिन इसके लिए उन्होंने बेहतर भावनात्मक जमीन तैयार की, इसमें कोई शक नहीं है।