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डाउनलोड करेंइस समय माता-पिता या तो अपने बच्चों को समय दे नहीं रहे होते हैं, या फिर जो समय दिया जा रहा है उसकी गुणवत्ता पर ध्यान नहीं देते। बहुत सारे माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए इस कदर बेताब हो गए कि वे भूल ही गए कि शिक्षा के साथ कुछ और भी इस समय दिया जाना चाहिए। महानगरों में पेरेंट्स भूल गए कि बड़े लोग अपने व्यावसायिक कार्यो के कारण परिवार से कट गए और बच्चे पढ़ाई के कारण परिवार से दूर हो गए।
दोनों ही स्थितियां खतरनाक हैं। शिक्षा बोझ बन जाए तो आप पढ़ा-लिखा मजदूर ही तैयार कर रहे हैं। शिक्षा केवल बुद्धि से होकर न गुजरे। शिक्षित होते समय हृदय की भूमिका बनी रहनी चाहिए। अपनापन, संवेदनाएं ये सब हृदय का विषय हैं। केवल बुद्धि से गुजरकर बच्चे बहुत जल्दी व्यावसायिक हो जाते हैं। शिक्षा का बंधन उन्हें कभी मुक्त नहीं होने देगा। जिस दिन वे शिक्षा पूरी करके दो पैसे कमाने निकलेंगे, वे अजीब सा अकेलापन और दबाव महसूस करेंगे।
बच्चों को अच्छी शिक्षा देते समय मां-बाप केवल इनके प्रोग्रेस कार्ड ही न पढ़ें, उनके मन को भी पढ़ें। बच्च मां-बाप के लिहाज में बाहर से कुछ और कर रहा होता है तथा भीतर से वो कुछ और सोच रहा होता है। कई बार तो मां-बाप को दु:खी देखकर बच्चे मन ही मन प्रसन्न होने लगते हैं। इस मनोविज्ञान को यदि माता-पिता नहीं समझेंगे, तो वे बच्चों को कर्मचारी और खुद को प्रबंधक के रूप में स्थापित कर रहे होंगे। बच्च इस दबाव से मुक्त होने के लिए या तो विस्फोट करेगा या फिर और दबाव में आ जाएगा।
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