पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

गुलामी से बेहतर है संघर्षपूर्ण मुक्ति

8 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक

अमेरिका में किसी समय दास प्रथा का प्रचलन था। नीग्रो जाति के लोग भेड़-बकरियों की तरह खरीदे व बेचे जाते थे। उनका जीवन मालिक की इच्छा व आदेश से संचालित होता था। अन्य अनेक लोगों के साथ अब्राहम लिंकन के प्रयासों से अमेरिका में दास प्रथा का अंत हुआ और नीग्रो जाति मुक्त हुई। मुक्त होने के बाद नीग्रो लोगों ने रोजगार खोजना शुरू किया। एक वृद्ध और अशक्त नीग्रो काम की तलाश में घूम रहा था।

घूमते-घूमते वह थक गया, किंतु काम नहीं मिला। वह एक स्थान पर बैठ गया। वहीं उसकी भेंट मालिक जाति के एक परिचित व्यक्ति से हुई। बूढ़े नीग्रो की दयनीय दशा देख वह व्यक्ति बोला- तुम्हारी यह क्या हालत हो गई। क्या किसी परेशानी में हो? नीग्रो ने कहा- काम नहीं मिल रहा है। वह व्यक्ति बोला- पिछले दिनों तो तुम्हारी स्थिति ठीक थी। नीग्रो बोला- उन दिनों मुझे बड़ा आराम था क्योंकि मेरा मालिक दयालु था।

वह मुझ पर कोई अत्याचार नहीं करता था और कठिन काम नहीं देता था। सहानुभूति जताते हुए उस व्यक्ति ने कहा- फिर तो तुम उन गुलामी के दिनों में ही बेहतर थे। यह मुक्ति तुम्हें महंगी पड़ गई। यह तुम्हारे किस काम की? यह सुनते ही उस बूढ़े नीग्रो में न जाने कहां से ताकत आ गई।

वह तनकर खड़ा हो गया और दृढ़ स्वर में बोला- जी नहीं, महोदय! दासता के जीवन से मुक्ति हजार गुना बेहतर है, क्योंकि हमारे जीवन पर अब सिर्फ और सिर्फ हमारा अधिकार है। उसे संवारने के लिए हम पूर्णत: मुक्त हैं। यह कहते हुए वह काम की तलाश में दोगुनी ताकत से चल दिया। मुक्ति मनुष्य के सर्वागीण विकास की पहली शर्त है। वस्तुत: पराधीनता पतन का द्वार है, जबकि मुक्ति प्रगति का।