महावीर के ध्यान के आगे हारा यक्ष

9 वर्ष पहले
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महावीर स्वामी अपने साधना-काल में एक निर्जन स्थान पर ध्यानमग्न बैठे थे। उसी स्थान पर एक यक्ष का वास था। यह बात महावीर को ज्ञात नहीं थी। वे तो वहां पहुंचे और शांत वातावरण देखकर ध्यानमग्न हो गए।
उस समय यक्ष वहां नहीं था। रात होने पर जब वह आया, तो अपने स्थान पर एक अनजान व्यक्ति को देखकर आग-बबूला हो गया। बड़े जोरों से वह दहाड़ा, किंतु महावीर का ध्यान भंग नहीं हुआ। यक्ष ने उन्हें हाथी का रूप धारण कर डराना चाहा, किंतु महावीर यथावत ध्यानमग्न बैठे रहे।
उसने महावीर को डराने के लिए क्रमश: शेर, चीता, बाघ आदि का रूप धारण किया, किंतु महावीर अविचलित ही बने रहे। अंत में उसने भयंकर विषधर का रूप धारण कर उनके पैर के अंगूठे को डस लिया। किंतु महावीर पर उसके विष का भी कोई असर नहीं हुआ। वे अब भी अप्रभावित रहे। विषधर उनके शरीर पर चढ़ गया और उनके गले पर लिपटकर उन्हें जोरों से काट लिया। इतने प्रयासों के बावजूद वह महावीर की साधना को भंग नहीं कर पाया।
थक-हारकर वह नीचे उतर आया और उनसे कुछ कदमों की दूरी पर लेटकर अपनी थकान उतारने लगा। ध्यान पूर्ण होने पर महावीर स्वामी ने उसकी तरफ देखा और उसे बहुत स्नेह से दुलारा। उनका निश्छल प्रेम देखकर सर्प का विष अमृत बन गया और यक्ष ने श्रद्धापूर्वक महावीर को नमन किया। कहानी का सार यह है कि मन की कलुषता पर एकाग्रता, स्नेह और समभाव से ही विजय प्राप्त की जा सकती है।