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डाउनलोड करेंमृत्यु दंड पर सर्वोच्च न्यायालय के नए निर्णय का परिणाम यह होगा कि बड़ी संख्या में ऐसे अपराधी उस सजा से बच जाएंगे, जो उनके जुर्म की जघन्यता के कारण उन्हें अदालतों ने सुनाई थी। इस फैसले से देविंदर सिंह भुल्लर जैसे आतंकवादी और राजीव गांधी के हत्यारों के भी फांसी से बच जाने की संभावना बन गई है। इस स्थिति के लिए सीधे तौर पर वर्तमान एवं पिछले दशकों की सरकारें जिम्मेदार हैं। दया याचिकाओं पर फैसला लेने में उनके टालू रवैये ने एक अस्वीकार्य हालत पैदा कर दी। अगर किसी को सजा-ए-मौत सुनाई जाती है तो उसकी जिंदगी का क्या होगा इस असमंजस को वर्षों तक नहीं खींचा जा सकता। दया दिखाते हुए अपराधी की सजा को उम्र कैद में बदलना है या उसे फांसी के तख्ते तक पहुंचाना है, यह निर्णय शीघ्र होना चाहिए।
अगर मृत्यु दंड देना है तो उस क्रम में तय प्रक्रियाओं का उचित भावना के साथ पालन हो, यह अपेक्षा बिल्कुल वाजिब है। चूंकि इन मामलों में सरकारों ने गंभीरता एवं संवेदनशीलता नहीं दिखाई, नतीजतन अब सर्वोच्च न्यायालय को इस बारे में कायदे तय करने पड़े हैं। मसलन, अब दया याचिका के निपटारे में बेवजह देर हुई तो वह सजा-ए-मौत को उम्र कैद में बदलने का आधार बनेगा और मानसिक रोग से पीडि़त मृत्यु दंड पाए कैदियों की सजा घटाई जा सकेगी। इसके अलावा फांसी देने से पहले अपराधी को परिजनों से मिलने का अवसर देना अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही कोर्ट ने यह प्रावधान भी किया है कि दया याचिका खारिज होने और फांसी की सजा देने में 14 दिन का अंतर होना अनिवार्य है।
इन प्रावधानों के अस्तित्व में आने से फांसी का प्रावधान आपराधिक दंड विधान में मौजूद रहने के बावजूद भारतीय न्यायिक व्यवस्था की अधिक मानवीय छवि बनेगी। दरअसल, ऐसे मामलों में पहल की अपेक्षा सरकारों और विधायिका से होती है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि अपने देश में सरकारें सुधार संबंधी कदम उठाने में हिचकती हैं और कई बार यह जिम्मेदारी न्यायपालिका पर टाल देती हैं। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला कार्यपालिका- और एक हद तक विधायिका की भी- कार्यशैली पर एक प्रतिकूल टिप्पणी है।
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