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मोदी समर्थक इन तर्को पर भी गौर करें

9 वर्ष पहले
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गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार केरूप में पसंद करने वाले उनके धुर समर्थकों का पहला तर्क यही होता है कि मोदी विकास पुरुष हैं और इस मामले में उनका कोई सानी नहीं है। लेकिन इस तर्क में कोई दम नहीं है।
पहली बात तो यह कि पिछले पांच साल (2007-2012, ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना) में सबसे ज्यादा विकास दर वाला राज्य गुजरात नहीं बल्कि बिहार (12.1 प्रतिशत) है। इस सूची में दूसरे नंबर पर भी गुजरात नहीं बल्कि उत्तराखंड (11.6 प्रतिशत) है। तो कहीं गुजरात तीसरे नंबर पर तो नहीं है? नहीं, यह गौरव दिल्ली (11.5 प्रतिशत) को हासिल है। 9.8 प्रतिशत की विकास दर के साथ गुजरात दरअसल चौथे स्थान पर है।
अब हम वर्ष 2002 से 2012 के बीच के दस सालों पर नजर डालें, जबकि मोदी ने गुजरात में मुख्यमंत्री पद पर लगातार दो कार्यकाल पूरे किए। क्या इस दौरान गुजरात विकास के मामले में शीर्ष पर रहा है? नहीं, इन दस सालों में सबसे तेजी से विकसित होने वालों में पहले नंबर पर दिल्ली (10.85 प्रतिशत) है। इस सूची में दूसरे और तीसरे नंबर पर बिहार तथा छत्तीसगढ़ हैं जिनके विकास की दर 10.4 प्रतिशत रही। गुजरात इस दौरान भी चौथे नंबर पर था। उसकी विकास दर 10.35 प्रतिशत रही।
अब यदि हम दूसरे राज्यों की बजाय गुजरात की तुलना गुजरात से ही करें तो क्या तस्वीर होगी? क्या मोदी ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने पांच साल की किसी भी अवधि में सबसे ज्यादा विकास दर हासिल की है? ऐसा नहीं है। गुजरात में सबसे ज्यादा विकास दर 1992 और 1997 के बीच दर्ज की गई थी जबकि राज्य की विकास दर 12.9 प्रतिशत रही। इस दौरान कांग्रेस और भाजपा के अलग-अलग मुख्यमंत्रियों ने शासन किया था जिनमें चिमनभाई पटेल, छबीलदास मेहता, केशुभाई पटेल, सुरेश मेहता और शंकर सिंह वघेला शामिल थे।
इसका मतलब यह नहीं है कि विकास के मामले में मोदी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। वे कई ऐसे मुख्यमंत्रियों में शामिल हैं जिनका विकास के मामले में रिकॉर्ड अच्छा है। लेकिन यह दावा करना कि मोदी विकास के मामले में बेजोड़ हैं, तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने जैसा है। कम से कम दो मुख्यमंत्रियों का दावा उनसे ज्यादा मजबूत है, बिहार के नीतीश कुमार और दिल्ली की शीला दीक्षित। शीला दीक्षित मोदी के मुकाबले ज्यादा समय से दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं (15 साल जबकि मोदी 11 साल से मुख्यमंत्री हैं) और नीतीश उनसे कम समय यानी सात साल से मुख्यमंत्री हैं।
लेकिन मोदी की कहानी में यह अकेली समस्या नहीं है। विकास-प्रेरित लोकप्रियता के तर्क को खारिज करने वाला सबसे बड़ा कारण यह है कि मोदी ने गुजरातियों का दिल विकास करने के बाद नहीं जीता। अक्टूबर 2001 में पार्टी में अंदरूनी तख्तापलट के बाद केशुभाई पटेल की जगह मोदी मुख्यमंत्री बने। छह महीने के भीतर ही उनके समर्थक उन्हें पार्टी का सर्वमान्य नेता तथा हिंदू हृदय सम्राट बुलाने लगे। इस रूपांतरण का कारण एक ही था। फरवरी से जून 2002 में गुजरात में हुए दंगे। गोधरा में मुसलमानों की एक भीड़ द्वारा 59 हिंदू कार सेवकों को जिंदा जलाए जाने के प्रतिशोध में अहमदाबाद और दूसरी जगहों पर करीब एक हजार मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया गया था।
आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं। गुजरात में मोदी को सबसे बड़ी जीत दिसंबर 2002 के चुनावों में मिली थी। ये चुनाव दंगों के बाद हुए थे, लेकिन उस समय तक मोदी को यह दिखाने का मौका भी नहीं मिला था कि वे विकास कर सकते हैं। 182 में से 126 सीटें जीतकर वे दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में सफल रहे। यह प्रदर्शन निस्संदेह बेहद प्रभावशाली था क्योंकि इससे पहले तक राज्य में भाजपा की हालत कमजोर होती नजर आ रही थी। करीब एक साल पहले केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री पद छोड़ने को मजबूर होना पड़ा था क्योंकि दो उपचुनावों में वे पार्टी को जीत दिलाने में असफल रहे थे। इसके बाद वर्ष 2007 और 2012 के चुनावों में मोदी की जीत का आंकड़ा छोटा होता गया। 2007 में उन्हें 117 जबकि 2012 में 115 सीटें मिलीं। इन आंकड़ों से दो तथ्य सामने आते हैं: पहला यह कि मोदी की लोकप्रियता का कारण तेज विकास नहीं था और दूसरा यह भी कि विकास के वादे पर खरा उतरने के बाद भी उनकी लोकप्रियता बढ़ी नहीं।
अब सवाल यह खड़ा होता है कि यदि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की मांग के पीछे सबसे अहम और वास्तविक कारण विकास नहीं है तो फिर क्या है? ऊपर के आंकड़े देखकर इस सच्चई की अनदेखी करना मुश्किल है कि मोदी की लोकप्रियता के कारण 2002 के दंगों में छुपे हैं और ठीक इसी तरह उनके विरोध के कारण भी इन दंगों में ही निहित हैं।
मोदी के समर्थकों के नजरिये से देखें तो उनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि उन्होंने मुसलमानों को उनकी स्थिति का अहसास करा दिया, लेकिन इससे विकास और शांति की प्रक्रिया को प्रभावित नहीं होने दिया। वर्ष 2002 के बाद से गुजरात में बहुत कम दंगे हुए हैं। इसके साथ-साथ उनकी कार्यशैली इसका वास्तविक कारण है, जो उनके विरोधियों (संघ परिवार के बाहर या अंदर) को तानाशाही पूर्ण लगती है, लेकिन उनके समर्थकों (खासकर व्यवसाय जगत में) की निगाहों में निर्णायक है। बाकी सारी चीजें प्रचार का नतीजा हैं जिसके चलते मोदी के समर्थकों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। यदि विकास वास्तव में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों के चयन का मापदंड होता तो हम नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी की बजाय नीतीश कुमार और शीला दीक्षित के बीच मुकाबले की चर्चा कर रहे होते। राहुल के मामले में तो अब तक यह भी पता नहीं है कि गांधी सरनेम के अलावा उनके पास और क्या है।
टोनी जोसेफ
बिजनेसवर्ल्ड के पूर्व संपादक और मीडिया सर्विस फर्म के चेयरमैन