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आदतें ले जाती हैं सहज जीवन से दूर

7 वर्ष पहले
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एक होता है हमारा स्वभाव और दूसरी होती है आदत। इन दोनों से मिलकर हमारे व्यक्तित्व का वह महत्वपूर्ण हिस्सा तैयार होता है, जिससे हम अपना सांसारिक जीवन चलाते हैं। स्वभाव तैयार करने के लिए भीतरी प्रयास करने पड़ते हैं। थोड़ा एकांत साधना पड़ता है। अपने भीतर उतरकर मन, हृदय व मस्तिष्क को टटोलना पड़ता है। भक्ति करने वालों के लिए भीतर उतरना थोड़ा आसान रहता है। कर्मकांड में उलझे लोगों को बाहर सुविधा रहती है। बाहर का सारा काम आदत से चलता है। इसलिए आदत पर टिके लोग बड़े कर्मकांडी बन जाते हैं। आदत का नतीजा अधिकांशत: अशांति है जबकि स्वभाव में जीने का परिणाम शांति है।

हमारे भीतर 90 प्रतिशत से अधिक आदतें दूसरों से आई होती हैं। यदि आप अपनी आदतों की सूची बनाएं तो पाएंगे कि इन्हें आपने जीवनभर दूसरों से ही एकत्रित किया है। इसीलिए ये आपकी जीवनयात्रा में सहायक बनने से अधिक व्यवधान बन जाती हंै। आदत के मामले में अत्यधिक सजगता रखिए, क्योंकि आपका शरीर आदतों से संचालित होता है। ये इतनी हावी हो जाती हैं कि शरीर पूरी तरह इन से नियंत्रित हो जाता है। आदतें प्राकृतिक जीवन-शैली से विपरीत दिशा में खींचती हैं। उदाहरण के तौर पर सूर्याेदय के आसपास उठना चाहिए। यह प्रकृति के निकट का निर्णय है, लेकिन आदत कहती है, देर से उठो। ऐसी कितनी ही आदतें हैं जो हमें सहज जीवनशैली से दूर ले जाती हंै। सावधान रहकर आदत से स्वभाव तक की यात्रा जारी रखें।