हरिशंकर परसाई के खजाने से: लाल बुझक्कड़

5 वर्ष पहले
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विपक्ष हमेशा जनता के सामने इसी बात का रोना रोता रहता है कि जो भी खराब कराया वह सत्ता पक्ष ने कराया। और विपक्ष यदि सत्ता में आ जाए तो भी इसी तरह का रोना रोता रहे तो एक दिन जनता यह जरूर सोचने लग जाती है कि सभी खराब और अच्छा फलां ने ही कराया है, तो तुम्हारे हाथ में कुछ नहीं है। और जिसके हाथ में कुछ नहीं उसे सत्ता छोड़कर रुमाल से हाथ पोंछ लेना चाहिए-
 
मेरे मोहल्ले में कुत्ते ने आदमी को काट लिया। बात आई-गई हो जानी चाहिए थी, पर हुई नहीं। 
 
देश का जैसा राजनीतिक वातावरण है, उसमें कोई बात आई-गई नहीं हो रही है।
 
तो लोगों में चर्चा चल रही है- इन्हें उसी कुत्ते ने क्यों काटा, दूसरे कुत्ते ने क्यों नहीं काटा? फिर कुत्ते ने इन्हीं को क्यों काटा? दूसरे आदमी को क्यों नहीं काटा? ऐन होली के मौके पर क्यों काटा? पहले भी काट सकता था। 
 
रोज ही इस आदमी का और कुत्ते का आमना-सामना होता रहा है, पर कुत्ते ने दक्षिण में इंदिरा गांधी की जीत के बाद ही क्यों काटा? यह मरियल, दब्बू, पिलपिला कुत्ता इसी वक्त काटने पर उतारू क्यों हो गया?
 
बड़े अहम सवाल हैं ये। कुत्ते के इस काटने में राजनीतिक दांव-पेंच मालूम होते हैं। 
 
साल-भर से देशवासियों की मानसिकता ऐसी हो गई है कि जो चीज जैसी है, वैसी नहीं मानी जाती। उसमें राजनीति तलाशी जाती है।
 
इधर मच्छर बहुत तंग कर रहे हैं। मेरे पड़ोसी कहते हैं बहुत मच्छर हैं और बड़े-बड़े हैं। 
 
मैं कहता हूं- गर्मी आ गई है और पास में नाला लगा हुआ है। मच्छर तो होंगे ही। 
 
पड़ोसी कहते हैं- नहीं साहब, यह बात उतनी ‘सिम्पल’ नहीं है। अभी कुछ दिन पहले ही लखनऊ विधानसभा में हुल्लड़ हुआ है। उसके बाद ही मच्छरों की यह विध्वंसक कार्रवाई तेज हुई है। यह खुलेआम हिंसा है। 
 
सामने मैदान में घास है और एक डबरा। डबरा हाल की बारिश में भर गया है। 
 
दो भैंसें धूप से परेशान होकर डबरे में लोट रही थीं। मेरे साथ जनता पार्टी का एक आदमी था, वह भैंसों को पत्थर मारने लगा।
 
मैंने कहा- लोटने दो भैंसों को तुम्हारा क्या लेती है?
उसने कहा-कर्नाटक, आंध्र में इंदिरा जीत गई हैं तो भैंसे किलोल कर रही है।
 
ऐसा माहौल है। मैं किससे पूछूं। एक लाल बुझक्कड़ है, राजनारायण। वे ही बूझते हैं- 
 
लाल बुझक्कड़ बूझते हैं और न बूझे कोय, 
पांव में चक्की बांध के हिरना कूदा होय।
मैं क्या राजनारायण से पूछूं कि कुत्ते ने क्यों काटा? मच्छर क्यों भनभनाए? भैंसें क्यों लोटीं? राजनारायण जनता पार्टी के मुंह है, जो चरणसिंह के सिर पर लगा है। सिर चरणसिंह खुद हैं। अफवाह है कि इस सिर में दिमाग भी है। भुजाएं जनसंघ है। ऐसी यह मूर्ति है। 
 
राजनारायण बूझेंगे- उस कुत्ते को इंदिराजी ने भड़काया था। उसने एक ऐसी ब्रिगेड बनाई है। वह उपद्रव कराके फिर अपनी तानाशाही कायम करना चाहती है। मच्छरों तक को उसने खून-खराबा करने के लिए उकसा दिया है। देखते नहीं हो, घोड़े किस कदर हिनहिनाते हैं। गधे रेंकते हैं, कौए कांव-कांव करते हैं। सब वही करा रही हैं।
 
मेरी बड़ी मुश्किल है। मैं मानना चाहता हूं कि इंदिरा गांधी खत्म हो गई। उनमें कोई शक्ति नहीं है, कोई उनके साथ नहीं है, जनता ने उन्हें त्याग दिया है।
 
मगर ये जनता के नेता मुझे यह मानने का संतोष नहीं लेने देते। इन्हें कहना तो यह चाहिए था कि इस देश में इंदिरा गांधी के कराए कुछ नहीं हो रहा है, मगर ये कहते हैं कि जो कुछ भी हो रहा है, वह उन्हीं के कराए हो रहा है।
 
पटना में लोकनायक के सम्मान में ऊंची जाति के लोगों ने शानदार हुल्लड़ किया। जनता नेताओं ने कहा- यह इंदिरा गांधी ने कराया। 
 
फिर नीची जाति के लोगों ने हुल्लड़ किया। जनता नेताओं ने कहा- यह भी इंदिरा गांधी ने कराया।
 
सही बात यह है कि दोनों हुल्लड़ों का नेतृत्व जनता पार्टी के नेताओं ने और ‘संपूर्ण क्रांतिकारियों’ ने किया। 
 
दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति के दफ्तर पर छात्र संघ के नेताओं ने हमला किया। ये लोग आरएसएस के हैं। जनता पार्टी के नेताओं ने कहा- हमला इंदिरा गांधी ने करवाया है। 
 
यानी आरएसएस भी इंदिरा गांधी के कहने पर चल रहा है।
 
फिर छात्र संघ के दफ्तर पर हमला हुआ। जनता नेता कहते हैं- यह भी इंदिरा गांधी ने कराया। 
 
कहीं हड़ताल- इंदिरा गांधी ने कराई। गुंडों ने बाजार लूट लिया- इंदिरा गाधी ने लुटवाया। कहीं डाका पड़ा- इंदिरा गांधी ने डलवाया। कहीं चोरी हो गई- इंदिरा गांधी ने करवाई। जेब कट गई- इंदिरा गांधी ने कटवाई। 
 
मेरा रोना तो यह है कि जनता पार्टी के नेता यह कहते हैं कि जो कुछ इस देश में हो रहा है, वह इंदिरा गांधी करवा रही है। हम कुछ नहीं करवा रहे हैं। कुछ करवाने की ताकत उनमें है, हममें नहीं है।
 
लोग उनके कहने से जूता-पत्थर फेंकते हैं, हमारे कहने से शांत नहीं रहते। हम कहते हैं, महंगाई घटी है, वह नहीं घटी है। हम कहते हैं, भ्रष्टाचार मिटा है, जो नहीं मिटा है। हम कहते हैं कानून व्यवस्था की हालत अच्छी है, जबकि बहुत खराब है। यानी जो-जो नहीं है, उसकी जिम्मेदारी तो जनता नेता लेते हैं, उसका श्रेय इंदिरा गांधी को देते हैं। 
 
इस देश का आदमी फिर सोचने लगा है। एक दिन लोग जनता नेताओं से कहेंगे- भैया लोगों, तुम कहते हो इस देश में जो भी होता है, वह इंदिरा गांधी कराती है, उनकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। तो भैया, तुम्हें राज करने का क्या हक है? तुम उसी को सत्ता सौंप दो और रुमाल से हाथ पोंछ लो। 
 
 
खजाने से- हरिशंकर परसाई, व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर
जन्म- 22 अगस्त 1922 
निधन- 10 अगस्त 1995
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