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शिंदे और जैल सिंह में कई समानताएं

9 वर्ष पहले
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अब तक देश के गृहमंत्री रहे हर राजनेता को इस पद पर काबिज रहे पहले शख्स की छाया में रहना पड़ा है। नॉर्थ ब्लॉक में गृहमंत्री के कार्यालय तक जाने वाली सीढ़ियों पर सरदार पटेल की एक आदमकद तस्वीर लगी है।
उन्हें किताबों में भारत के लौहपुरुष के रूप में महिमामंडित किया गया है, तो स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े वे शायद कांग्रेस के अकेले ऐसे नेता भी हैं, जिनकी आज भी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से इतर आम स्वीकार्यता है(मत भूलिए मायावती महात्मा गांधी के खिलाफ बोल चुकी हैं)। शायद यही कारण है कि कभी जिस कुर्सी पर सरदार पटेल बैठा करते थे, उस पर बैठने में सुशील कुमार शिंदे को परेशानियां आ रही हैं।
एक कांस्टेबल से शुरुआत कर सब इंस्पेक्टर, फिर महाराष्ट्र के दो बार मुख्यमंत्री और राज्यपाल पद से होते हुए लोकसभा के नेता और गृह मंत्री पद पर पहुंचे शिंदे राजनीति में लगातार आगे बढ़ने की प्रथा के चमकते उदाहरण हैं। जाति आधारित राजनीति के इस युग में दलित होना उनके लिए फायदेमंद रहा है, हालांकि इसमें भी कोई संदेह नहीं कि शिंदे ने जाति को कभी अपनी कामयाबी का जरिया नहीं बनाया। हमेशा मुस्कराते रहने वाले शिंदे की अविवादित छवि गठबंधन के दौर में फिट बैठती है। फिर भी गृह मंत्री का कार्यालय न तो कोई राजभवन है, जहां करने के लिए कुछ खास नहीं होता और न ही इसे अगाध निष्ठा के पुरस्कार के रूप में देखा जा सकता है।
दुर्भाग्य से लगता है, यूपीए सरकार ने ऐसा ही किया है। ऐतिहासिकरूप से गृह मंत्री की हैसियत सरकार में अघोषित नंबर दो की रही है। सरदार पटेल गृह मंत्री के साथ-साथ उप प्रधानमंत्री भी थे। लालकृष्ण आडवाणी भी इन दोनों पदों पर थे। 1960 और 70 के दशक तक गृहमंत्री को करीब-करीब प्रधानमंत्री के समान ताकतवर हस्ती के रूप में देखा जाता था। राजाजी, वाईबी चव्हाण, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी (1970 से 73 तक एक साथ प्रधानमंत्री और गृह मंत्री रहीं) और चरण सिंह जैसे प्रभावशाली लोगों को उनकी राजनीतिक हैसियत को देखते हुए इस पद पर नियुक्त किया गया।
वर्ष 1980 में इंदिरा गांधी द्वारा ज्ञानी जैल सिंह को इस पद पर नियुक्त किए जाने के साथ गृहमंत्री की भूमिका में बदलाव की शुरुआत हो गई। बतौर गृहमंत्री जैल सिंह का दो साल का कार्यकाल पूरी तरह असफल रहा। इसी दौरान सिख अलगाववाद के विचार ने आकार लिया, उत्तर-पश्चिम के राज्य हाशिये पर धकेल दिए गए और कश्मीर उबलने लगा। जैल सिंह को इनके लिए जिम्मेदार ठहराने के बजाय वर्ष 1982 में उन्हें राष्ट्रपति बनाकर पुरस्कृत किया गया। ‘यदि मेरी नेता मुझसे झाड़ू लगाने के लिए भी कहतीं तो मैं ऐसा करता’- ज्ञानीजी ने यह कहकर राजनीतिक चाटुकारिता की परिभाषा ही करीब-करीब बदल दी। जैल सिंह और शिंदे के बीच विचित्र समानताएं हैं। दोनों दलित हैं, दोनों सीमित राजनीतिकआधार के बावजूद मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने में सफल रहे और दोनों गांधी परिवार के परंपरागत भक्त के रूप में देखे जाते हैं। गृह मंत्री बनने के बाद शिंदे के पहले इंटरव्यू में मैंने उनसे पूछा कि क्या यह आरोप सही है कि उन्हें इस पद पर केवल इसलिए बिठाया गया है, क्योंकि वे आंखें बंद कर 10 जनपथ के निर्देशों का पालन करेंगे? इसके जवाब में उन्होंने कहा था, मैं आज जो कुछ भी हूं, वह सोनियाजी की बदौलत हूं। वो मुझसे जो भी कहेंगी, मैं करूंगा। उनका यह जवाब बरबस ज्ञानीजी की याद दिला गया था।
यदि ज्ञानीजी ने देश को पंजाब का जख्म दिया था तो शिंदे भी पुरानी आग को हवा देने तथा नए जख्म पैदा करने की स्थितियां बना रहे हैं। पहले उन्होंने कांग्रेस के चिंतन शिविर के दौरान भगवा आतंक वाला हलका बयान दिया। एक पल के लिए शिंदे भूल गए कि वे देश के गृह मंत्री हैं, न कि कांग्रेस पार्टी के राजनीतिक एजेंट। भाजपा और आरएसएस पर आतंकी कैंप चलाने का सीधा आरोप लगाकर उन्होंने एक नया विवाद खड़ा कर दिया, जिससे सरकार और विपक्ष के रिश्ते और ज्यादा खराब हो गए। दक्षिणपंथी आतंक का अस्तित्व जरूर है, लेकिन इससे पक्के सबूत और निष्पक्ष जांच-पड़ताल के साथ निपटा जाना चाहिए, न कि पार्टी मंचों से दलगत आधार पर लगाए गए आरोपों से।
हिंदू आतंक संबंधी उनके बयान के कुछ ही सप्ताह के अंदर अफजल गुरु की फांसी के मामले को जिस तरह निपटाया गया, उसने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामलों को संभालने की उनकी क्षमता पर पहले से ज्यादा गंभीर सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने फांसी को नौकरशाही द्वारा हर दिन निभाई जाने वाली ऐसी जिम्मेदारी के रूप में देखा, जिसमें न्यूनतम मानवीयता की भी गुंजाइश नहीं थी। यह संभव है कि वे केवल आदेश का पालन कर रहे हों या वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की सलाह पर अमल कर रहे हों। लेकिन, एक गृहमंत्री को चमकती आंखों और चेहरे पर बनावटी हंसी के साथ अफजल को फांसी देने और उसके परिवार को स्पीड पोस्ट के जरिये सूचना देने की घोषणा करते हुए देखा जाना भारतीय राष्ट्र की कमजोर पड़ती नैतिकता के सबसे दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरणों के रूप में गिना जाएगा। यदि एक वर्ष की लगातार शांति के बाद कश्मीरी अवाम को अलगाव और पीड़ित होने की अपनी भावना को व्यक्त करने का नया प्रतीक मिला है, तो इसकी जिम्मेदारी शिंदे और उनके सलाहकारों को लेनी चाहिए। क्या किसी सभ्य व्यवस्था में अफजल के परिवारवालों को फांसी से पहले उससे एक बार मिलने का आखिरी मौका नहीं दिया गया होता?
कश्मीर समस्या का एक पुराना और विवादित इतिहास रहा है और कोई भी गृह मंत्री इसे अब तक सुलझा नहीं पाया है। लेकिन तेलंगाना का क्या? शिंदे ने पहले तो जोर-शोर से घोषणा कर दी कि वे एक महीने के अंदर तेलंगाना के भविष्य को लेकर किसी फैसले की घोषणा करेंगे, लेकिन अब वे इस पेचीदा मुद्दे पर कुछ भी बोलने से हिचकिचा रहे हैं। उनके टालमटोल वाले रवैये ने सरकार की विश्वसनीयता को और अधिक नुकसान पहुंचाया है और इसके गंभीर परिणाम कांग्रेस पार्टी को आगामी लोकसभा चुनाव में भुगतने पड़ सकते हैं। इस पड़ाव पर शिंदे के लिए खुद को बदलना मुश्किल है, लेकिन उन्हें यह तो समझना ही होगा कि गृह मंत्री रहते हुए वे हर संकट का मुकाबला मुस्कराकर नहीं कर सकते।
पुनश्च: शिंदे को ऊर्जा मंत्रालय से हटाकर गृह मंत्रालय की कमान उसी दिन दी गई जिस दिन देश को सबसे बड़े बिजली संकटों में से एक का सामना करना पड़ा था। स्पष्ट है कि कांग्रेस की राजनीति में कई बार असफलता ही सफलता का कारण बनती है।
राजदीप सरदेसाई
आईबीएन 18 नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ