पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

एशियाई खेलों में कितनी उम्मीद?

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
एशियाड आज ओलिंपिक के बाद दुनिया में बहु-स्पर्धाओं वाला दूसरा सबसे बड़ा खेल आयोजन है। इन खेलों से भारत का खास भावनात्मक लगाव भी है, क्योंकि इनकी शुरुआत प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की खास पहल से हुई थी। 1951 में इनका पहला मुकाम नई दिल्ली ही बना था। गुलामी की जंजीरें तोड़कर आजाद हो रहे एशियाई देश आपस में खेल के जरिये नए और स्वतंत्र रिश्ते जोड़ें, अपने इस सपने को साकार करने के लिए पंडित नेहरू ने वह नींव डाली, जो आज फूल-फलकर वैश्विक आकर्षण का केंद्र है। पहले एशियाई खेलों में भारत पदक तालिका में जापान के बाद दूसरे नंबर पर रहा था। फुटबॉल, तैराकी और एथलेटिक्स में हमारे खिलाड़ियों ने विजय ध्वज फहराए थे, मगर उसके बाद की कथा दूसरे देशों के आगे बढ़ने और भारत के उनसे पीछे छूटने की रही, लेकिन यह निराशाजनक सिलसिला 2006 में दोहा और 2010 में चीन के ग्वांगझाऊ एशियाड में टूटता दिखा। चार साल पहले भारत 14 स्वर्ण और 17 रजत के साथ कुल 65 मेडल जीतकर पदक तालिका में छठे नंबर पर रहा, तो उसे करिश्माई प्रदर्शन माना गया। जब आज से दक्षिण कोरिया के इंचियोन में खेलों का सबसे बड़ा एशियाई मेला फिर लग रहा है, तो प्रमुख सवाल यही है कि क्या यहां भारत ग्वांगझाऊ के प्रदर्शन से आगे निकलेगा? खेल अधिकारियों ने पहले तो 70 से 100 पदक जीतने की महत्वाकांक्षा जताई थी, मगर बाद में उन्होंने अपने अनुमान 70-75 पदकों तक सीमित कर दिए। 17वें एशियाड के लिए गया भारतीय दल अपेक्षाकृत छोटा है। भारतीय खेल प्राधिकरण का दावा है कि सिर्फ उन खिलाड़ियों को ही इंचियोन भेजा गया है, जो पदक जीत सकने में सक्षम हैं। बहरहाल, 516 एथलीटों के इस दल से सर्वाधिक आशाएं मुक्केबाजी, निशानेबाजी, कुश्ती, टेनिस और कबड्‌डी में हैं। ग्वांगझाऊ में एथलेटिक्स में हैरतअंगेज प्रदर्शन करते हुए भारत ने 5 स्वर्ण और 2 रजत समेत कुल 12 पदक जीते थे। इस बार यह सफलता दोहराना संभवतः कठिन होगा, मगर भारतीय दल के सामने असली चुनौती यही है कि वह पिछली बार से ज्यादा पदक लेकर लौटे। वरना, इस सदी में विभिन्न खेलों में उत्थान के दिखे रुझान से जगी उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा।