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सर्वेक्षण के संकेत और सवाल

9 वर्ष पहले
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संसद में पेश वार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण के दो खास निहितार्थ हैं। इसकी पहली कोशिश उम्मीद बंधाने की है। कहा गया है कि आर्थिक गिरावट का सबसे बुरा दौर गुजर गया है। यानी आगे सुधार ही होना है। अनुमान लगाया गया है कि 2013-14 में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 6.1 से 6.7 फीसदी रहेगी।
चूंकि सर्वेक्षण का अंदाजा है कि मार्च से महंगाई दर नियंत्रित हो जाएगी और पिछले बजट में तय राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया जाएगा, अत: विकास दर में बढ़ोतरी का रास्ता खुल जाएगा। चूंकि ये बातें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं, इसलिए यह अहम सवाल है कि क्या वास्तव में ऐसा होगा? इसलिए कि पेट्रोलियम के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और खाद्य पदार्थो की महंगाई काबू में आती नहीं दिखती।
राजकोषीय घाटे पर काबू के लिए सार्वजनिक निवेश में कटौती के संकेत हैं। ऐसे में अर्थव्यवस्था की ऊंची वृद्धि दर को हासिल करना टेढ़ी खीर हो सकता है। बहरहाल, ऐसा हो जाता है, तब भी आम आदमी के लिए उसका क्या अर्थ है, यह एक बड़ा सवाल है। खुद इस वार्षिक दस्तावेज में रोजगार के मोर्चे पर बढ़ती चुनौतियों को स्वीकार किया गया है। कहा गया है कि रोजगार बाजार में ज्यादा संख्या में लोगों के प्रवेश और अर्थव्यवस्था में कृषि का हिस्सा सिकुड़ने के कारण बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है।
अच्छे रोजगार विकास और समावेशन को हासिल करने के मार्ग हैं, अत: देश को रोजगार पैदा करने के तरीकों के बारे में सोचना होगा। यानी रोजगार पैदा न करने वाले विकास को अब आधिकारिक रूप से मान लिया गया है। अत: ताजा सर्वेक्षण ने वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के सामने मौजूद चुनौतियों को रेखांकित कर दिया है, जिन्हें आज यूपीए-2 सरकार का आखिरी पूरा बजट पेश करना है। उनके बजट को निश्चित रूप से राजकोषीय घाटे पर काबू पाने और महंगाई रोकने के लिए अपनाए गए उपायों तथा निवेश के लिए अनुकूल स्थिति बनाने की कसौटियों पर परखा जाएगा। लेकिन इस पर भी नजर रहेगी कि आखिर वे रोजगार पैदा करने की क्या सूरत निकालते हैं, जिससे विकास सचमुच समावेशी बन सके, जो यूपीए का वादा रहा है।