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अपने आप से बात करती हमारी फिल्में

8 वर्ष पहले
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भारतीय फिल्में जिंदगी की खूबसूरत तस्वीर पेश करती हैं। वे हमें सच, न्याय, समानता और प्रेम जैसे मूल्यों से जुड़ना सिखाती हैं। फिल्में एक राष्ट्र की तरह हैं जो अपने आप से बात कर रहा है। हमारी फिल्में बहुत कुछ बोलती हैं। बहुत सारी भाषाओं, ढेर सारी कानाफूसी और अनंत सपनों के जरिये वे अपनी बात सुनाती हैं।
मैं अपनी पसंदीदा हीरोइन की बात का खंडन करते हुए शुरुआत करता हूं। हमारी फिल्में केवल मनोरंजन, मनोरंजन, मनोरंजन के संबंध में ही नहीं हैं। वे हमारे जीवन के बारे में हैं। और अगर आप सौभाग्यशाली हैं कि आपकी जिंदगी आपको खुशहाल रखती है तो आप वैसी ही फिल्में भी देखते हैं।
मैं जब तीन वर्ष का था, तब से हिंदी फिल्में देख रहा हूं। हमारे घर के ठीक सामने ग्रेस नामक सिनेमाघर था। मैं वहां लगे फिल्मों के विशालकाय होर्डिग देखते हुए घंटों गुजार देता था। यह होर्डिग सीढ़ियों पर किसी तरह लटके अस्त-व्यस्त से दिखाई देने वाले कलाकार हाथ से बनाते थे। वे कोरे कैनवास लटका देते थे और फिर चुपचाप उनकी कूची चलती रहती थी और वे उसमें रंग भरते थे। उन्हें देखना एक सबक था। मुझे होर्डिग पर बनाई गई मधुबाला की तस्वीर की आंखें, चेहरा और होंठ याद हैं। ऐसा लगता था जैसे वे बोलने लगी हैं। हर गुरुवार को सूरज ढलने के बाद उनका काम शुरू होता था। शुक्रवार की सुबह वहां से गुजरने वाले लोग उन होर्डिग्स को देखने के लिए जुट जाते थे।
मैं अकेले ही उन्हें देखने वाला नहीं था। रात होते ही सड़क पर और भी लोग जमा हो जाते थे। गैस की रोशनी में काम होता था। धीरे-धीरे भीड़ टिकट लेने वाली एक लंबी कतार में बदल जाती थी। सुबह नौ बजे टिकट खिड़की खुलती थी। मुझे याद है उस वक्त अगली कतार की सीट की टिकट दस आने में आती थी। किसी के लिए भी इससे अधिक पैसे जुटाना मुश्किल था। मैं दस आने के लिए टैगोर, नेहरू, मार्क्‍स और भारत के भविष्य पर बहस करने वाले अपने बड़े भाइयों से मिन्नत करता था। वे लोग अकेले मैटिनी शो देखने चले जाते थे।
मैं आज जो कुछ भी हूं उस जमाने में देखी गईं फिल्मों की बदौलत हूं। वैसे इसमें केवल फिल्मों की ही भूमिका नहीं है। मेरी मां के हाथों का बना खाना। गांधीजी के बारे में मेरे पिता द्वारा सुनाई गईं कहानियां। जो किताबें मैंने पढ़ीं। कविता, संगीत। सुबह के समय रविशंकर की भैरवी। शाही यमन राग में बिस्मिल्ला खान की बंदिशें। इन सबका मुझ पर प्रभाव पड़ा। उस वक्त की ढेर सारी सुनहरी और रंगारंग यादें ध्यान में आती हैं। उन दिनों ट्राम के किराये में एक पैसे की बढ़ोतरी से कलकत्ता का आसमान आग की लपटों से घिर जाता था। या दंगा करने वाले दो गिरोह अमीनुद्दीन डागर को सड़क से निकलते देखकर रुक जाते थे। दोनों पक्ष उस्ताद का सिर झुकाकर अभिवादन करते थे। और उनके निकलते ही खून-खराबा करने लगते थे। वह शानदार दौर था। मैंने जो कुछ भी जिंदगी के बारे में सीखा है, वह संकरी सड़कों पर घूमते हुए और अंधेरे में डूबे सिनेमाघरों के विशाल परदों को निहारते हुए सीखा है।
फिल्मों ने मुझे सिखाया है कि जिंदगी बेहद खूबसूरत है। उनसे मैंने सीखा कि कितना कुछ भी गलत हो जाए, अंत में न्याय की जीत, बुराई की पराजय और अच्छे व्यक्ति की विजय होती है। और हर बार कुछ सीखने मिलता था। जिंदगी के वे सबक मेरे साथ मुश्किल दौर में रहे और उन्होंने मुझे सहारा दिया। उन्होंने मुझे आशा, साहस, न्याय और आत्मविश्वास की सीख दी। और जब सिनेमा के रुपहले परदे पर अमिताभ बच्चन अवतरित हुए, तब हमने समझा कि किसी चीज से डरने की जरूरत नहीं है। हम सब पहरेदार हैं।
फिल्मों ने हमें जो सबसे अच्छी बात सिखाई वह है प्रेम और स्नेह। धर्म, जाति या कुछ भी प्रेम के आड़े नहीं आ सकता। समाज के कुछ कहने या डराने, धमकाने का भी कोई मतलब नहीं है। प्रेम से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। हमारी फिल्मों ने हमें प्रेम करना और महिलाओं का सम्मान करना सिखाया है, चाहे वे कोई भी हों और कहीं से भी आई हों। उन्होंने केवल हमें प्रेम ही नहीं, बल्कि कहानी कहने के आसान अंदाज में समानता, न्याय, सत्य, सम्मान, गरिमा, आशा और बहुत कुछ सिखाया है। ऐसी कहानियां जो हमें बेहतर जीवन जीने, हिम्मत से काम लेने और बहादुरी की प्रेरणा देती हैं।
फिल्में एक राष्ट्र की तरह हैं जो अपने आप से बात कर रहा है। हमारी फिल्में बहुत कुछ बोलती हैं। बहुत सारी भाषाओं, ढेर सारी कानाफूसी और अनंत सपनों के जरिये वे अपनी बात सुनाती हैं। फिल्में धीरे-धीरे समझाने के अंदाज में कहानी कहती हैं। जो लोग फिल्मों में नाच और गानों को फूहड़ मानते थे, वे भी धीरे-धीरे उसकी तरफ आकर्षित होते गए। शैलियां बढ़ती गईं। कहानियां अधिक विविध हो गईं। विषय-वस्तु और प्रस्तुति का अंदाज व्यापक हो गया। लेकिन जो नहीं बदला वह है, उनके पीछे निहित विश्वास, कलाकारी, हजारों लोगों का टीम वर्क जिनमें से कई अशिक्षित हैं और जो हम तक इन कहानियों को पहुंचाने के लिए परदे के पीछे काम करते हैं। हमारी फिल्मों की मांग दुनिया में भी बढ़ रही है। इस वर्ष कान फिल्म महोत्सव में पहले के मुकाबले अधिक भारतीय फिल्में दिखाई जाएंगी। महोत्सव की ज्यूरी में शामिल होने के कारण विद्या ने हमारी फिल्म की शूटिंग से ब्रेक लिया है।
13 साल पहले जब प्रीतीश नंदी कॉपरेरेशन (पीएनसी) ने फिल्में बनाना शुरू किया, तो कई लोगों को संशय था। मेरे मित्रों, साथी पत्रकारों, चित्रकारों, लेखकों ने हैरानी जताई कि मैं फिल्में बनाने के लिए सब कुछ क्यों छोड़ रहा हूं। मैंने कुछ भी नहीं छोड़ा। मेरे लिए तो हमारी फिल्मों में ही सब कुछ है। ठीक उसी तरह जैसे जिंदगी की सब आकर्षक और अच्छी चीजें एक जगह पर आ जाती हैं। इस बात पर विश्वास करना असंभव प्रतीत होता है कि हमने इन सालों में पच्चीस फिल्मों का निर्माण कर लिया है। और इससे मैंने जिंदगी के बारे में जितना सीखा है किसी और बात से नहीं। मैं विश्वास करता हूं, हम जो कुछ भी हैं अपनी फिल्मों के कारण हैं। इस देश को यह समझने में सौ साल लगे हैं। लेकिन आज फिल्मों में हमारी तस्वीर झलकती है और फिल्में ही हमारा आईना हैं।