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गांवों पर पड़ती महंगाई की मार

7 वर्ष पहले
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इस खबर से कांग्रेस की चिंता अवश्य बढ़ेगी कि बीते नवंबर और दिसंबर के महीनों में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई की मार शहरों से अधिक गांवों पर पड़ी है। आमतौर पर यही माना जाता है कि शहर की जिंदगी गांवों से महंगी होती है। मगर बीते साल के आखिरी दो महीनों में शहरी मुद्रास्फीति की दर क्रमश: 10.53 और 9.11 प्रतिशत थी, वहीं यह ग्रामीण इलाकों में 11.66 और 10.49 फीसदी दर्ज की गई। हाल में जो सियासी रुझान देखा गया है उसके मुताबिक शहरों में कांग्रेस की जमीन खासी कमजोर नजर आती है। इसलिए पार्टी की अधिक उम्मीदें देहाती क्षेत्रों पर ही टिकी होंगी। मगर वहां उपभोक्ता सामग्रियों की कीमत तेजी से चढ़ी है तो केंद्र में सत्ताधारी गठबंधन के लिए उसके खराब सियासी नतीजे हो सकते हैं। हाल के विधानसभा चुनावों में महंगाई सबसे प्रमुख मुद्दा होकर उभरी थी।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल में स्वीकार किया है कि उनकी सरकार महंगाई रोकने में कामयाब नहीं रही है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा है कि महंगाई बढऩे का एक कारण लोगों की आमदनी में हुई बढ़ोतरी भी है। आर्थिक क्षेत्र के कुछ जानकारों का कहना है कि देहाती इलाकों में मुद्रास्फीति अधिक होने का मतलब है कि कारोबार का रुख कृषि क्षेत्र के हक में हुआ है। कृषि पैदावार के लिए अधिक समर्थन मूल्य, मनरेगा के तहत मजदूरों की सुनिश्चित आय और सब्जियों के अधिक दाम मिलने से गांवों में आमदनी बढ़ी। इससे बढ़ी खुशहाली मुद्रास्फीति में झलक रही है। बहरहाल, ऐसे आर्थिक तर्कों से लोगों को उस वक्त कोई राहत नहीं मिलती जब वे जरूरी चीजें खरीदने बाजार जाते हैं और उन्हें जेब से अधिक पैसा निकालना पड़ता है।

हकीकत तो यह है कि मुद्रास्फीति बर्दाश्त के बाहर पहुंच गई है, जिससे चिंतित भारतीय रिजर्व बैंक ब्याज दरों को लगातार बढ़ाता जा रहा है, लेकिन यह उपाय महंगाई रोकने में अपर्याप्त साबित हुआ है। बीते वर्षों में यूपीए सरकार ने महंगाई रोकने के कोई ठोस उपाय नहीं किए। कृषि क्षेत्र में वायदा कारोबार खत्म करने की मांग पर वह चुप रही। राहुल गांधी की पहल पर अब कांग्रेस शासित राज्यों की सरकारें फल और सब्जियों को कृषि मंडी उत्पाद समिति कानून से बाहर लाने पर सहमत हुई हैं, लेकिन अब काफी देर हो चुकी है। अगर महंगाई का सियासी नतीजा होना है, तो कांग्रेस शायद उससे बच नहीं पाएगी।