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अपना भला करें पर दूसरों का बुरा न हो

निज हित की कामना सभी के भीतर होती है। कोई भी काम करना हो, अपना भला जरूर हो ऐसी भावना सभी रखते हैं।

पं. विजयशंकर मेहता | Last Modified - Nov 07, 2017, 05:29 AM IST

अपना भला करें पर दूसरों का बुरा न हो
निज हित की कामना सभी के भीतर होती है। कोई भी काम करना हो, अपना भला जरूर हो ऐसी भावना सभी रखते हैं। लोग अपने भले के लिए ही कार्य आरंभ करते हैं। बहुत कम लोग होते हैं जो अपना भी अच्छा हो जाए और दूसरे का बुरा भी न हो ऐसी वृत्ति रखते हों। ऐसी वृत्ति हो तो अपनी भलाई सोचना स्वार्थ नहीं होगा। हमें स्वार्थ छोड़कर ऐसे काम जरूर करने चाहिए, जिनसे दूसरों का भला हो। कैसे अपना भला हो जाए, दूसरे का बुरा न हो यह श्रीराम से सीखा जा सकता है। लंका कांड में भगवान राम अंतिम समय तक प्रयास करते रहे कि रावण के भीतर की बुराई मिट जाए। जामवंत के प्रस्ताव पर अंगद को दूत बनाकर भेजना तय हुआ। अंगद रामजी की सेना का सबसे युवा सदस्य था। नई पीढ़ी को समय रहते अधिकार और जिम्मेदारियां सौंप देनी चाहिए। अंगद जाने लगे तो श्रीराम ने उन्हें बड़ी अद्‌भुत शिक्षा दी। तुलसीदासजी ने लिखा, ‘बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊॅ। परम चतुर मैं जानत अहऊॅ।।’ काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई।। रामजी कहते हैं, ‘अंगद, मैं जानता हूं तुम परम चतुर हो परंतु रावण से बात करते समय पूरी तरह से सावधान रहना। वैसी ही बात करना, जिससे हमारा काम भी हो जाए और उसका भी कल्याण हो। यह कहने के लिए बड़ी ताकत चाहिए। राम जैसे लोग ही ऐेसे संवाद बोल सकते हैं। जब हम भक्ति कर रहे हों, उसमें अपना भला जरूर सोचिए पर दूसरे का बुरा न हो जाए, इसे लेकर भी सावधान रहिए।
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