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सुबह उठना यानी प्रकृति से श्रेष्ठतम लेना

आजकल जितने भी काम कठिन माने जाते हैं उनमें से एक है सुबह जल्दी उठना।

Danik Bhaskar | Nov 18, 2017, 05:48 AM IST
आजकल जितने भी काम कठिन माने जाते हैं उनमें से एक है सुबह जल्दी उठना। आने वाले 10-15 साल बाद तो शायद देश के घरों में जल्दी उठने वाली पीढ़ी ही खत्म हो जाएगी। जल्दी उठने का महत्व तब समझेगा जब प्रात:काल का मतलब समझ में आएगा। प्रात:काल यानी सूर्योदय की घड़ी। चूंकि उस समय सूरज प्रकट होता है, इसलिए ध्यानमय, ज्ञानमय और पराक्रममय ऊर्जा बिल्कुल ताजी-ताजी प्रकट होती है। इस समय सारे देवता अपनी शक्ति के साथ हवा के रूप में आते हैं। शास्त्रकारों ने तो कालपुरुष को एक घोड़े की उपमा देते हुए कहा है कि उषाकाल यानी प्रात:काल उस घोड़े का सिर है। जिसने यह समय गंवाया, समझो उसने कालपुरुष का सिर ही काट दिया। इसलिए सुबह उठना केवल बिस्तर छोड़ना नहीं, उससे भी ज्यादा प्रकृति से कुछ पकड़ना है। सुबह जल्दी उठना एक अनुशासन है। फिर दिनभर हमें परिश्रम करना है। जिसे अनुशासन का स्पर्श मिल जाए वह कम श्रम में भी ज्यादा परिणाम पा लेगा। एक पहलवान दूसरे पहलवान को गिराकर उसकी छाती पर चढ़ जाए तो ऊपर वाले को ज्यादा ताकत लगती है, क्योंकि उसे फिक्र रहती है कि नीचे वाला पहलवान खिसक न जाए। परिश्रम नीचे वाले पहलवान की तरह है। हमने ऊपर वाले के रूप में उस पर अनुशासन लाद दिया है। अनुशासन को दबाव न बनाएं। सुबह उठने का मतलब यूं समझें कि प्रकृति जो अपना श्रेष्ठ दे रही है, हमें वह लेना है।