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मूर्ति को प्राण के भाव से पूजें, परिणाम मिलेंगे

​शास्त्रों में लिखा है मूर्ति पूजा आदमी को ईमानदार बनाती है।

Dainik Bhaskar

Nov 23, 2017, 07:32 AM IST
jeene ki raah by pandit vijay shankar mehta
शास्त्रों में लिखा है मूर्ति पूजा आदमी को ईमानदार बनाती है। लेकिन, मूर्ति के मामले में पूजा का अर्थ अलग ढंग से समझना होगा। कोई मूर्ति तब पूजने योग्य होती है, जब उसकी प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। यानी मनुष्य की तरह पत्थर में प्राण डालना। जब किसी ऐसी मूर्ति की पूजा करते हैं, उसमें तो प्राण देखना ही है, आपके साथ जो जीवंत लोग रहते हैं उनके भीतर के प्राणों का भी मोल समझना है। लोग मूर्ति को तो पूजते हैं पर आसपास रहने वालों के प्रति तो संवेदनशील होते हैं, प्रेमपूर्ण। जिस दिन घर में बच्चों के, पति-पत्नी, माता-पिता या किसी सदस्य के भीतर प्राण देख लेंगे, आपका पूरा व्यवहार बदल जाएगा। हम मूर्ति के सामने माथा झुका रहे हैं और अपने लोगों से झगड़ रहे हैं यह कहां तक ठीक है? सही है कि प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति आपको देख रही होती है लेकिन जब कोई गलत काम करते हैं तो मूर्ति यह नहीं पूछती कि ये तुमने क्या किया? बल्कि यह बताती है कि तुम कुछ श्रेष्ठ कर सकते थे, जो नहीं किया। वे सजग करती हैं कि अपने आचरण को ऐसे उठाओ। जिन धर्मस्थलों पर प्राण प्रतिष्ठित मूर्तियां हों वहां इसीलिए जाना चाहिए कि उस जगह मंत्रोच्चार हो चुका होता है, कई लोग वहां श्रद्धा अर्पित करते हैं। जीवन के लिए ऊर्जा, मार्गदर्शन और प्रेरणा प्राप्त होती है। मूर्ति को प्राण के भाव से पूजा जाए तब तो परिणाम मिलेंगे, वरना आप केवल पत्थर पूजकर रहे हैं, जो मात्र औपचारिकता है, जिसका कोई सदपरिणाम प्राप्त नहीं होगा।
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jeene ki raah by pandit vijay shankar mehta
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