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डाउनलोड करेंएक समय था कि लोग समाज और परिवार में जीते हुए उसके अनुशासन को मानते थे। फिर व्यक्तिगत स्वतंत्रता का आग्रह शुरू हुआ। लोगों ने इस अनुशासन की नई परिभाषाएं गढ़ीं। कुछ लोगों ने इसका अतिक्रमण किया। यह फायदे और नुकसान दोनों का सौदा साबित हुआ। जैसे-जैसे लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रति रुचि बढ़ी, अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने में वे और बहादुर होते गए। बल्कि कई लोग तो अपनी संवेदनाओं को व्यक्त करने में दादागिरी पर उतर आए। घर-परिवार में भी एक सभ्य गुंडागिर्दी के लक्षण नजर आने लगे। जो भावनाएं कभी ढाल हुआ करती थीं, देखते ही देखते हथियार बन गईं। यह भी सही है कि अपनी भावनाओं को दबाना ठीक नहीं है। समाज में प्रदर्शन और औपचारिकता इतनी बढ़ गई है कि लोग अपने प्रियजन की मृत्यु पर रोना भी दबा लेते हैं।
आंसू गिराना कमजोरी और गंवार होने का लक्षण मान लिया जाता है। विरह में आंखें छलकें, तो समझें संवेदनाएं व्यक्त होने का मार्ग ढूंढ़ रही हैं। हालांकि नए जमाने में मान लिया जाता है कि पढ़े-लिखे, सभ्य और प्रतिष्ठित लोगों की आंखें नम नहीं होतीं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता के इस कालखंड में जब आप हर तरह से स्वतंत्र होना चाहते हैं तो अपनी भावनाओं को भी समय पर अभिव्यक्ति दें। रोने और हंसने में कोई अतिरिक्त दिखावटी अनुशासन न लादें। इसके लिए भक्त बनना बड़ा सहयोगी होगा। जो लोग भक्ति का अर्थ समझते हैं वे विरह और मिलन में आंसू-मुस्कान को बाधा नहीं बनने देंगे।
पं. विजयशंकर मेहता- humarehanuman@gmail.com
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