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डाउनलोड करेंअच्छे लोगों की हम निकटता चाहते हैं और जो हमें पसंद नहीं है उनसे हम भागना चाहते हैं। इन दोनों में हमारा अहंकार बाधा बनता है। अहंकार हमें उन लोगों से दूर ले जाता है जिनकी निकटता में हम स्वयं को जान सकते हैं, लेकिन हमारा मन इसमें बाधा बनता है। मन का क्रियात्मक रूप ही अहंकार है। सुंदरकांड में समुद्र और श्रीराम के बीच यही हुआ। जब श्रीराम आवेश में आए तब समुद्र मार्ग देने को तैयार हुआ और मणियों का थाल भरकर भगवान के सामने पहुंचा। 'मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।' मगर सांप तथा मछलियों के समूह व्याकुल हो गए। जब समुद्र ने जीवों को जलते जाना, तब सोने के थाल में अनेक मणियों को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मण के रूप में आया। इस प्रसंग पर तुलसीदासजी ने दो इशारे किए हैं। श्रीराम के क्रोध के आगे जलचर जलने लगे थे।
समुद्र को लगा इसका कारण मैं हूं। चूंकि उसे राम का सान्निध्य मिल रहा था इसलिए उसके अहंकार ने गलना शुरू किया और वह समझ गया कि यदि मैंने अभिमान नहीं छोड़ा तो मुझे श्रीराम की निकटता नहीं मिलेगी। फिर वह अभिमान छोड़कर उपस्थित हुआ। परमात्मा के सामने, गुरु के सामने और अपने माता-पिता के सामने हमें अभिमान शून्य होकर जाना चाहिए, क्योंकि अहंकार हटने के बाद हम इन तीनों के समक्ष अपना समर्पण भाव ला सकेंगे। वरना हमारा अहंकार इनसे दूर भागता है। इनका सान्निध्य नसीब वालों को ही मिलता है।
पं. विजयशंकर मेहता- humarehanuman@gmail.com
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