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हर जगह सम्मान पाती है योग्यता

7 वर्ष पहले
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वे सौभाग्यशाली होते हैं, जिन्हें अच्छे काम करने का मौका मिल जाता है। काम अच्छा हो, हमारे भीतर जिम्मेदारी निभाने की इच्छा हो तो जब परिणाम आता है उसका आनंद ही अलग है। इस मामले में हनुमानजी बहुत सौभाग्यशाली थे। यूं तो उन्होंने जो भी काम किए हैं कमाल के ही किए हैं, लेकिन किष्किंधा कांड में उन्होंने जो किया, संभवत: और कोई नहीं कर पाया होगा। श्रीराम और लक्ष्मण को उन्होंने कंधे पर बैठा लिया था। पहली मुलाकात में सारी बातें होने के बाद हनुमानजी ने श्रीराम को प्रस्ताव रखा, ‘आप दोनों भाई मेरे कंधे पर बैठिए, मैं सुग्रीव के पास ले चलता हूं।’ श्रीराम तो तैयार हो गए, क्योंकि बहुत सीधे-सरल और हनुमानजी के प्रभाव में भी थे, लेकिन लक्ष्मणजी थोड़ा बिदक गए।
उन्होंने कहा हम अयोध्या से महामंत्री सुमंत के रथ पर बैठकर चले। वह समझ में आता है। फिर केवट की नाव में विराजे। वह भी ठीक था। फिर पैदल चले, यहां तक भी स्वीकार करने लायक बात है, लेकिन अब यह कौन सा तरीका है यात्रा करने का। श्रीराम ने कहा, ‘लक्ष्मण, अब ये आ गया है। सारी रामकथा अब इसी के कंधे पर चलने वाली है। मैं बैठ रहा हूं, तुम भी चुपचाप बैठ जाओ। श्रीराम का सदैव कहना मानना लक्ष्मणजी की विशेषता थी, इसलिए चुपचाप बैठ गए। जिस परमात्मा ने सारे ब्रह्मांड का बोझ उठा रखा हो, उसे कंधे पर बैठा लेना परम सौभाग्य है। हनुमानजी संदेश दे रहे हैं कि हम भी इतने योग्य बनें कि सक्षम से सक्षम व्यक्ति भी हमारी योग्यता का सम्मान करने लगे।
पं. विजयशंकर मेहता | humarehanuman@gmail.com
web:hamarehanuman.com