मुझे इससे कोई लेना-देना नहीं है, तुम जानो, तुम्हारा काम जाने, मुझे बेकार में डिस्टर्ब मत किया करो। ऐसे संवाद हम अपने जीवन में दूसरों को बोल चुके होते हैं। ये संवाद ध्वनि देते हैं कि हमें आपकी परेशानियों से कोई लेना-देना नहीं है। बात सही भी है। दुनिया में किस-किस की मुसीबत आप मोल लेंगे। हालांकि, जब ऐसे संवाद पति-पत्नी के बीच चलने लगे, तो यह अनैतिक ही होगा। कई जीवनसाथी एक-दूसरे से इस तरह के संवाद बोलते हैं, जो उनके दाम्पत्य के लिए बहुत घातक है। ध्यान दीजिए, जीवनसाथी में से किसी एक के ऊपर भी यदि समस्या आई है, तो वह भागीदारी के साथ निपटाई जानी चाहिए। यह कॉमन प्राब्लम ही होगी। इस समस्या को खंड-खंड करके न देखा जाए।
दोषपूर्ण होते हुए भी आप उस समस्या में अपने जीवनसाथी को अकेले नहीं छोड़ सकते। उसे उपदेश देने के और भी मौके आएंगे, लेकिन समस्या के समय तुरंत साथ खड़े हो जाएं। यदि आप अपने जीवनसाथी की समस्या को महत्व नहीं देते हैं तो इसका सीधा-सा मतलब है आप उसके अस्तित्व को नकार रहे हैं। समाधान पर पहुंचने के तीन चरण हैं - पहला, संवाद करिए। उस समस्या पर सामने वाला जो भी बोल रहा है उसे पूरा सुनें। सुनने से आप उसे यह महसूस कराते हैं कि आप उसे महत्व दे रहे हैं। फिर सहानुभूति जताइये और उसके बाद सक्रिय हों। संवाद, सहानुभूति और सक्रियता किसी भी पति-पत्नी के बीच की समस्या को निपटाने के लिए सुंदर सूत्र है।
पं. विजयशंकर मेहता | humarehanuman@gmail.com
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