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वाणी का दान सोच-समझकर करें

7 वर्ष पहले
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चौबीस घंटे में हम जो भी काम करते हैं उसमें से एक काम है अनवरत बोलना। किसी के प्रश्न पूछने पर उत्तर दें तब भी, किसी से प्रश्न पूछें उस समय भी आप वक्ता रहते हैं। चलने में पैरों की सावधानी रखनी पड़ती है और हम रखते भी हैं। चलते समय हम हाथों का उपयोग भी सावधानी से करते हैं। आंखों के प्रति भी सजग रहते हैं। चूंकि जिह्वा मुंह में सुरक्षित है, इसलिए इसके उपयोग के मामले में हम घोर लापरवाह होते हैं। यदि आप अच्छे वक्ता हैं, तो यह बात आपके व्यक्तित्व को निखारेगी। अत: जब भी बोलें, तैयारी से बोलें। मुझसे प्राय: यह पूछा जाता है कि आप इतना कैसे बोलते हैं? मैं महीने में पच्चीस दिन व्याख्यान, प्रवचन देता हूं, इसलिए यह प्रश्न स्वाभाविक है।
भले ही पांच मिनट बोल रहे हों या दो घंटे, एक-दो लोगों से बात कर रहे हों या अनेक लोगों को संबोधित कर रहे हों, यह सावधानी जरूर रखिए कि जो आप बोल रहे हैं क्या उसका आपको ज्ञान है। आपके बोले गए शब्द दूसरों के लिए कितने उपयोगी हैं। शब्दों में अर्थ हो या न हो, लेकिन अनर्थ न हो। उच्चारण दोष न रहे यह तो वक्ता से अपेक्षा होती ही है, लेकिन विचार भी दोषपूर्ण न हों। आपकी वाणी दूसरे के लिए उत्साह, प्रसन्नता और उद्‌देश्य देने वाली बने, तब आपका वक्ता होना सार्थक है। केवल बोलने के लिए न बोलें। दूसरे के सुनने लायक हो, ऐसा बोलें। वाणी का दान सोच-समझकर करिए। परमात्मा ने आपको शब्द भी गिन कर दिए हैं। आप नहीं हिसाब रख सकें, पर ऊपर वाला जरूर रखता है।
पं. विजयशंकर मेहता | humarehanuman@gmail.com
web:hamarehanuman.com