भारत आदर्श संयुक्त परिवार है। संयुक्त परिवार को बचाने वालों ने दो काम किए थे। एक, प्रत्येक सदस्य के स्वभाव का अध्ययन किया और उसे उसी छत के नीचे जीने की स्वतंत्रता दी। दो, त्याग सिखाया। धीरे-धीरे संयुक्त परिवारों के जुड़ाव का तीसरा कारण आया- आर्थिक गतिविधि। एक ही व्यापार-व्यवसाय के कारण जुड़े रहे, लेकिन धन के अपने दोष हैं। जिस धन से संयुक्त परिवार जुड़े रहे, वही धन उन्हें तोड़ता भी गया। भारत के साथ भी यही हुआ। यहां अनेक जाति, धर्म के लोग हैं। सबके अपने-अपने काम हैं, लेकिन फिर भी आए दिन अशांति, उपद्रव, हिंसा है। ऐसा धर्म व राष्ट्रीयता को न समझने के कारण है।
मनुष्य अपनी वासना और आर्थिक लोलुपता के कारण अपराध करे तो समझ में आता था, पर जब अपराध धर्म और राष्ट्रीयता की आड़ में हों यह बहुत खतरनाक स्थिति है, इसलिए नेतृत्व देने वाले, समाजसेवी, संजीदा लोगों को कहीं न कहीं राष्ट्रीयता के साथ धर्म और धर्म के साथ आध्यात्मिकता को बुद्धिमानी से जोड़ना पड़ेगा। इसमें जितनी देर होगी उतने खतरे बढ़ेंगे। आज राष्ट्र के साथ धर्म को जोड़ो तो लोग तुरंत सांप्रदायिकता का शोर मचाने लगते हैं। इसे बार-बार समझाया जाए कि धर्म का मतलब दस लक्षणों को जीवन में उतारना है। धैर्य, क्षमा, दम (संयम), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (शुद्धि, पवित्रता), इंद्रीय निग्रह (आंतरिक संयम), धी, विद्या, सत्य और अक्रोध। इन दस लक्षणों में से कोई भी ऐसा नहीं है जो मनुष्य को ऊंचा न उठाए। धर्म का मतलब है किसी को भी श्रेष्ठ होने की संभावना देना। फिर इसे राष्ट्रीयता, अपने काम से क्यों न जोड़ा जाए? इसलिए धर्म की गलत परिभाषा न करें और इस संयुक्त परिवार को प्रेमपूर्ण बनाने के लिए केंद्र में धर्म रखा जाए, तभी भारत, भारत रहेगा।
पं. विजयशंकर मेहता
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