जंगल का एक नियम है, जो भी कमजोर पशु अकेला छूटा, वह अपने से बड़े हिंसक पशु का शिकार हो जाएगा। इसीलिए हम पाते हैं कि जंगल में पशु दौड़ते ही रहते हैं, क्योंकि पता नहीं कब आक्रमण हो जाए, कब खतरा सामने आ जाए। आजकल नगरीय जीवन में भी ऐसा ही होने लगा है। आप जिस भी शहर में रहते हों कमोबेश उसमें कुछ जंगलराज समानांतर चल रहे हैं। किसी कॉर्पोरेट ऑफिस में जाएं, किसी बड़े मॉल में जाएं, बाजार की भीड़ हो या विवाह का उत्सव, सब जंगलराज की तरह एक-दूसर के शिकार में लगे हैं। कभी-कभी तो शिकार इस तेजी से होता है कि शिकार और शिकारी का फर्क भी खत्म हो जाता है। शिकारी शिकार बन सकता है, शिकार शिकारी बन जाता है। जंगल में पशु भी जानता है कि समूह में रहेंगे तो बच जाएंगे। शहर में हमें भी समूह में रहने की जरूरत है।
मनुष्य की अधिक संख्या भीड़ भी कहलाती है और समूह भी। भीड़ का न कोई उसूल होता है न कोई भाव, लेकिन भीड़ यदि व्यवस्थित हो जाए, किसी एक अच्छे उद्देश्य के लिए एकत्र हो जाए तो समूह बन जाएगा। केवल समूह से भी काम नहीं चलेगा। समूह में जब एक-दूसरे के हित की बात हो तो यह एकता संगठन बन जाती है। आज घर में पति-पत्नी भी भीड़ की तरह रहते हैं, भटक रहे हैं। इन्हें संगठन में बदलना होगा। इसीलिए भारतीय संस्कृति ने विवाह को गठबंधन कहा है, क्योंकि संगठन एक-दूसरे के हित के लिए होता है। संगठन के परिणाम सदैव हितकारी होते हैं। हर परिवार का हर सदस्य एक-दूसरे से एक संगठन बनाकर चले। अन्यथा आज एक छत के नीचे भारी भीड़ इकट्ठी हो गई है। बाहर से अकेलापन और भीतर से भीड़ की अशांति मनुष्य की नीति बन गई है, इसलिए एक बार फिर परिवार में भी संगठन पर काम किया जाना चाहिए।
पं. विजयशंकर मेहता
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