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हृदय पर केंद्रित होकर भय दूर करें

समय बदला तो कच्ची उम्र में वह ज्ञान और जानकारी भी आ गई जो परिपक्व होने पर आती थी।

Dainik Bhaskar

May 14, 2015, 07:14 AM IST
jeene ki rah by pandit vijay shankar mehta
आज जिसे देखो वह डरा हुआ है। पहले बच्चे अज्ञात से डरते थे, अब ज्ञात से डरने लग गए। पहले बच्चों को कुछ बातों का ज्ञान होता भी नहीं था और दिया भी नहीं जाता था। समय बदला तो कच्ची उम्र में वह ज्ञान और जानकारी भी आ गई जो परिपक्व होने पर आती थी। यहीं से भय भी बढ़ा। पहले बच्चों को डर लगता था तो मां के आंचल में छुप जाते थे या पिता के कंधे पर चढ़ जाते थे। अब तो वह आंचल खुद भयभीत है, वे कंधे खुद डरे हुए हैं। आइए, आज इसी पर विचार करते हैं। जैसे ही जीवन में कोई भय आए सबसे पहले पता लगाएं कि यह बाहर आ कहां से रहा है। फिर उसका इलाज निकालें और यदि वह लाइलाज है तो इससे मुक्त होने के लिए बाहर कम और भीतर ज्यादा काम करिए। हमारे शरीर में तीन हिस्से ऐसे हैं जहां भय का इलाज मिल सकता।
मस्तिष्क भय के मामले में भविष्य में पटकता है कि अब क्या होगा? ये सारे विचार मस्तिष्क में जन्मते हैं और उसका इलाज भी यहीं से निकलना है, इसलिए मस्तिष्क पर काम किया जाए। चिंतन को स्पष्ट करिए। हृदय वर्तमान में जीता है। भय की स्थिति में तुरंत हृदय पर टिक जाएं। यहां पवित्रता है, शांति है, प्रेमपूर्ण वातावरण है। जितना हृदय पर टिकेंगे, भय से मुक्त होने लगेंगे। हृदय का स्वभाव है भरोसा करना। ईश्वर पर भरोसा ​बढ़ाइए, हृदय मदद करेगा और आप भय से मुक्त होंगे। हमारे भीतर तीसरा स्थान है मन। तुरंत इससे मुक्त हो जाएं, क्योंकि मन भय के मामले में अतीत और भविष्य दोनों पर कूदता है। मन आपके भय को और विस्तारित करेगा, इसलिए मन से कटकर मस्तिष्क और हृदय पर टिकने का प्रयास करें। जब भय का वातावरण हो तो अकेले न रहें। चाहे आपका भगवान आपके साथ हो या कोई अच्छा इंसान।
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