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जीवन में पहल करने की वृत्ति बढ़ाइए

6 वर्ष पहले
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सभी के जीवन में कहीं न कहीं धोखे और अपमान की घटनाएं हुई होंगी। ऐसी घटनाओं के बाद व्यक्ति सभी को संदेह की दृष्टि से देखने लगता है या वह अत्यधिक सावधान हो जाता है। जब अपमान मिलता है तो बदले की भावना जाग जाती है या फिर निराशा व कुंठा जाग जाती हैं। धोखा और अपमान तो कभी भी हो सकते हैं। तब क्या करेंगे? न तो बदले की वृत्ति रखें और न ही अत्यधिक संदेह में डूबें। बस सावधान रहकर अच्छे काम की पहल करें। आदमी बहुत रिजर्व होता जा रहा है। चार लोगों के बीच में कोई हमें देखकर बात नहीं करे, तो हम सोचते हैं हम क्यों पहल करें। मान-अपमान के झंझट में माफी मांगने की बात आए तो हम सोचते हैं कि हम क्यों पहल करें।
जब ऐसी आदत मन में बस जाती है तो हम बोझिल होने लगते हैं, इसलिए चाहे कितन ही धोखे मिले, अपमानित हों, लेकिन पहल करना मत छोड़िए। अपनी पहल में प्रेम, सम्मान, आश्वासन, प्रोत्साहन और समर्थन का भाव जरूर रखें। पहल का मतलब अहंकार का प्रदर्शन न हो। इसमें यह भावना जोड़ लीजिए कि परमात्मा ने हमें अवसर दिया है। आप अपनी पहल करने की वृत्ति को जैसे-जैसे बढ़ाएंगे आप पाएंगे कि दुनिया के कई लोगों के लिए आप बहुत महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं और यह भी एक उपलब्धि है।
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