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चर्चिल ने दिखाई असीम सहनशीलता

8 वर्ष पहले
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वर्ष 1915 में चर्चिल ब्रिटेन के नौसेना मंत्री थे। उस समय नौसेना अध्यक्ष थे एडमिरल लार्ड फिशर। फिशर का स्वभाव कटु था और वे चर्चिल को सदैव परेशान करते रहते थे। दोनों के मध्य प्राय: किसी न किसी मुद्दे पर बहस हो जाती थी। कोई भी मामला हो दोनों के बीच एक राय नहीं बन पाती। इतना ही नहीं फिशर, चर्चिल की बुराई हर एक व्यक्ति से करते। अंतत: दोनों के बीच अनबन इतनी बढ़ गई कि चर्चिल को अपना पद ही छोडऩा पड़ा। चर्चिल के लिए यह बहुत दुखद था, किंतु उन्होंने फिशर की निंदा में एक शब्द भी नहीं कहा। इस घटना को हुए लंबा समय हो गया।

एक दिन चर्चिल के किसी मित्र ने उनसे बातचीत के दौरान इस दुखद प्रसंग की चर्चा की और इस संदर्भ में फिशर की आलोचना कर दी। चर्चिल ने मित्र की बात सुनकर बड़ी ही साफगोई से कहा, क्रयदि मुझे पुन: वही पद मिल जाए तो मैं फिशर को बुलाकर उन्हें फिर से वही काम सौंप दूंगा। इसका कारण यह है कि फिशर एक कुशल प्रबंधक हैं और उस रूप में उनके लिए मेरे दिल में बहुत सम्मान है। यह सम्मान पहले भी था और आज भी है। उनकी काबिलियत को लेकर मेरे मन में कोई संदेह नहीं है।'

कुछ वर्षों बाद फिशर की आत्मकथा प्रकाशित हुई, जिसमें उन्होंने चर्चिल की कठोर शब्दों में निंदा की थी। जाहिर था फिशर के मन में इतने वक्त बाद भी कटुता गई नहीं थी। वह पुस्तक जब चर्चिल ने पढ़ी तो उन्हें कई बातें बेतुकी और गलत लगीं, किंतु उन्होंने फिशर की बुराई तब भी नहीं की, बल्कि उस पुस्तक की प्रशंसा में एक लंबा आलेख तैयार कर प्रकाशन हेतु एक पत्रिका को भेज दिया। सहनशीलता, बड़प्पन की निशानी है। जिन लोगों में यह गुण होता है, वह किसी भी प्रकार की प्रतिकूलता में विचलित नहीं होते।