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कसौटी पर खरे उतरे ठक्कर बापा

8 वर्ष पहले
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गोपालकृष्ण गोखले भारत के स्वाधीनता आंदोलन के अग्रणी नेताओं में से थे। गांधीजी ने उन्हें अपना राजनीतिक गुरु माना था। उन्होंने एक संस्था बनाई थी क्रभारत सेवक समाजञ्ज। वे इस संस्था में उन्हीं लोगों को प्रवेश देते थे, जिनकी राष्ट्रभक्ति विभिन्न स्रोतों से सिद्ध हो जाए। दूसरे शब्दों में कहें तो यह कि गोखलेजी पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही किसी को संस्था में भर्ती करते थे। बंबई (मुंबई) नगर पालिका में एक इंजीनियर थे, जो इस संस्था में आकर राष्ट्रसेवा की इच्छा रखते थे।

संकोचवश उन्होंने गोखलेजी को स्वयं पत्र न लिखकर किसी ओर से पत्र लिखवाकर अपनी इच्छा व्यक्त की। उन्हें शंका थी कि गोखलेजी उन्हें अपनी संस्था की सदस्यता देंगे अथवा नहीं। इस कारण उन्होंने परिचित से यह भी कहा कि पहले मैं क्रभारत सेवक समाजञ्ज को प्रार्थना पत्र दूंगा। यदि वह मंजूर हो गया तो नगर पालिका की नौकरी से इस्तीफा दे दूंगा। ऐसा इसलिए कि मेरा प्रार्थना पत्र मंजूर न होने की स्थिति में नई नौकरी कहां खोजता फिरूंगा? यह सब गोखलेजी की जानकारी में आया तो उन्होंने इंजीनियर को कहलवाया कि पहले वह नौकरी से इस्तीफा दे, फिर उसके प्रार्थना पत्र पर विचार किया जाएगा।

वस्तुत: वे इंजीनियर की देश सेवा की भावना की परीक्षा लेना चाहते थे। मगर इंजीनियर पक्का देशभक्त निकला। उनका संदेश मिलते ही उसने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। तत्पश्चात गोखलेजी ने उसे अपनी संस्था में प्रवेश दे दिया। यह इंजीनियर आगे चलकर महान राष्ट्रभक्त ठक्कर बापा के नाम से जाना गया। देश सेवा के लिए सर्वप्रथम निजी हितों का सर्वथा त्याग करने वाला सच्चा राष्ट्रप्रेमी होता है। यह एक कदम उसकी देशभक्ति को सािबत कर देता है।