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डाउनलोड करेंगोपाल कृष्ण गोखले बहुत बड़े देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानी थे। उनके बाल्यकाल की एक घटना है जो सिद्धांतों के प्रति उनके निष्ठावान होने का प्रमाण है और आज भी युवा पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक है। गोपाल एक दिन अपने बड़े भाई गोविंद के साथ कबड्डी खेल रहे थे। गोविंद विरोधी टीम में थे।
जब खेलते हुए गोविंद के आगे आने की बारी आई तो उन्होंने गोपाल को इशारा किया कि वे उन्हें न पकड़ें और अपनी टीम के लिए अंक जुटाने दें। अपने बड़े भाई के संकेत को गोपाल ने समझकर भी नहीं माना और अपनी टीम की ओर से पूरी शक्ति के साथ गोविंद को पकडऩे में जुट गए। संघर्ष लंबा चला, किंतु अंतत: गोविंद पकड़े गए। हालांकि बात खेल की ही थी, लेकिन इस बात का गोविंद को बहुत बुरा लगा।
उन्होंने सोचा कि उम्र में छोटा होकर भी गोपाल ने उनका आग्रह नहीं माना। यह ठीक बात नहीं है। घर लौटते समय उन्होंने खेल की इस घटना का जिक्र करते हुए अपने भाई के व्यवहार पर आपत्ति ली और कहा, 'गोपाल! जब मैंने तुझे मना किया था कि मुझे नहीं पकडऩा तो तूने मुझे क्यों पकड़ा?
तू मेरा भाई है या दुश्मन, जो बड़े भाई की इतनी-सी बात भी नहीं मान सका? अगर मान लेता तो मुझे टीम में मान मिलता।' बड़े भाई की बात सुनकर गोपाल ने कहा, 'भैया? आपके प्रति मेरे मन में पूरी श्रद्धा है। आप जो भी कहेंगे, मैं मानूंगा, किंतु खेल में जब आप विरोधी टीम में हैं तो मैं आपका साथ नहीं दे सकता। ऐसा करने की अपेक्षा तो मैं खेल से हट जाना पसंद करूंगा।' स्वयं से पांच वर्ष छोटे गोपाल की ईमानदारी ने बड़े भाई को अपने आचरण पर लज्जित कर दिया। वस्तुत: ईमानदारी ऐसी नैतिकता है, जो आत्मशुचिता बनाए रखते हुए समाज को संस्कार संपन्न बनाती है।
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