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डाउनलोड करेंपंडित मदनमोहन मालवीय ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना दान से एकत्रित राशि से की थी। असंख्य लोगों के पास पंडितजी दान मांगने गए। अनेक संस्थाओं से सहायता मांगी। अनेक जगहों से पंडितजी खाली हाथ लौटे। कई स्थानों से बहुत प्रयास करने पर दान मिल सका। कुल मिलाकर यह कि पंडितजी के अथक परिश्रम का नतीजा था काशी हिंदू विश्वविद्यालय। इस कारण उन्हें इस विश्वविद्यालय से बहुत लगाव था।
वे प्राय: यहां आते और इसके सभी स्थानों पर स्वयं घूम-घूमकर देखते कि कहीं कोई परेशानी तो नहीं है। एक बार पंडित मालवीय विश्वविद्यालय के एक छात्रावास का निरीक्षण करने गए। वहां के प्रत्येक कमरे में पंडितजी गए और छात्रों से उनकी समस्याएं पूछीं। वहीं एक कमरे में उन्होंने देखा कि छात्र ने दीवार के एक कोने में पेंसिल से कुछ हिसाब लिख रखा है।
यह दृश्य देखकर मालवीय दुखी हुए। उन्होंने छात्र को समझाया, क्रदेखो बेटा! मेरे मन में तुम्हारे प्रति जितना स्नेह और लगाव है, उतना ही स्नेह व लगाव विश्वविद्यालय की प्रत्येक ईंट से है। मैं तुमसे आशा करता हूं कि भविष्य में तुम ऐसी गलती नहीं करोगे।ञ्ज फिर उन्होंने जेब से रूमाल निकालकर दीवार को साफ कर दिया।
विश्वविद्यालय के प्रति मालवीय की ऐसी निष्ठा देखकर छात्र स्वयं के व्यवहार पर लज्जित हुआ और उसने उनसे क्षमा मांगकर भविष्य में ऐसा कभी नहीं करने का संकल्प लिया। उक्त प्रसंग आज के उन दिग्भ्रमित युवाओं के लिए सबक है, जो अपने शिक्षा संस्थानों की संपत्ति को नुकसान पहुंचाना अपना परम धर्म मानते हैं। वस्तुत: छात्रों का गैर जिम्मेदाराना रवैया शिक्षा संस्थान के साथ-साथ स्वयं उनकी छवि और प्रगति को हानि पहुंचाता है। अत: इससे बचना चाहिए।
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