पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर
डाउनलोड करेंमहात्मा गांधी ने जब बचपन में 'सत्य हरिश्चंद्र' और 'श्रवण कुमार' नाम के दो नाटक देखे तो वे उनके संदेश से बहुत प्रभावित हुए। 'सत्य हरिश्चंद्र' देखकर गांधीजी ने आजीवन सत्य बोलने और 'श्रवण कुमार' देखकर मातृ-पितृ भक्ति का प्रण लिया। एक बार उनके विद्यालय में सभी बच्चों के लिए 'खेलकूद' विषय अनिवार्य कर दिया गया। खेलकूद के लिए जल्दी विद्यालय पहुंचना होता था। हालांकि गांधीजी की रुचि खेलकूद में नहीं थी। फिर भी वे प्रतिदिन इस नियम का पालन करते थे। एक दिन वे अपने पिता के खराब स्वास्थ्य के चलते उनकी सेवा में लगे हुए थे।
आसमान में बादल छाए होने के कारण उन्हें समय का पता नहीं चला। जब विद्यालय पहुंचे तो खेलकूद का समय समाप्त हो चुका था और सभी बच्चे मैदान से जा चुके थे। अगले दिन प्रधानाध्यापक ने उनसे खेल में न आने का कारण पूछा तो वे बोले, 'मैं तो आया था, किंतु वहां कोई नहीं था।' प्रधानाध्यापक ने विलंब का कारण पूछा तो उन्होंने कहा, 'मेरे पास घड़ी नहीं थी। आसमान में बादल होने के कारण मुझे समय का पता नहीं चला।ञ्ज किंतु प्रधानाध्यापक ने समझा कि गांधीजी झूठ बोल रहे हैं। उन्होंने गांधीजी पर दो आने का जुर्माना लगा दिया। गांधीजी स्वयं को झूठा समझे जाने के दुख में रो पड़े।
बहुत कहने पर भी प्रधानाध्यापक ने गांधीजी की बात पर यकीन नहीं किया। तब गांधीजी ने अपने मन में निश्चय किया कि वे जीवन में कभी असत्य नहीं बोलेंगे और अपने भीतर ऐसा आत्मबल पैदा करेंगे कि लोग भी उसे सत्य ही मानें। दृढ़व्रती होकर सत्य को अपने संपूर्ण आचरण में उतारने वाले का नैतिक पक्ष इतना मजबूत हो जाता है कि शेष समाज उसे सही मानकर उसके सम्मान में स्वत: ही झुक जाता है।
Copyright © 2021-22 DB Corp ltd., All Rights Reserved
This website follows the DNPA Code of Ethics.