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अपंग कार्ली ने जीता ओलिंपिक पदक

7 वर्ष पहले
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वर्ष 1940 की बात है। हंगरी के सर्वश्रेष्ठ निशानेबाज घोषित हुए थे कार्ली टैकास। निशाना अचूक होता था और अपनी इसी प्रतिभा के बल पर उन्होंने अनेक स्पर्द्धाएं जीतीं और अनेक महत्वपूर्ण पदक अपने नाम किए। उनकी अद्वितीय योग्यता के मद्‌देनजर उनका चयन जापान में होने वाले ओलिंपिक खेलों के लिए किया गया, लेकिन इसी बीच द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ गया। पूरी दुनिया में उथल-पुथल मच गई। हंगरी से भेजी गई सेना में कार्ली टैकास भी थे। अब कार्ली युद्ध के मैदान में थे और पूर्ण मनोयाेग से युद्ध में हिस्सा ले रहे थे। निशानेबाजी की अचूकता वे युद्ध के मैदान में दिखा रहे थे। 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हुआ और 1948 में होने वाले ओलिंपिक की तैयारी शुरू हो गई। कार्ली, हंगरी की समस्त आशाओं का केंद्र थे। वे स्वयं भी अत्यधिक उत्साह के साथ खेल की तैयारी कर रहे थे, लेकिन ओलिंपिक शुरू होने से पूर्व ही मोटर दुर्घटना में टैकास का दाहिना हाथ कट गया।
कुछ समय के लिए तो वे बहुत निराश हो गए, किंतु फिर सोचा कि हारना नहीं है, किसी भी हाल में जीतना है। जब 1948 में लंदन में ओलिंपिक खेलों का आयोजन हुआ तो निशानेबाजी में प्रथम आने वाले खिलाड़ी का दाहिना हाथ नहीं था। दर्शक इस अद्वितीय खिलाड़ी को देखने के लिए उमड़ पड़े। अपने बाएं हाथ से निशानेबाजी की चैम्पियनशिप जीतने वाले थे- कार्ली टैकास। शरीर की दुर्बलता पर विजय प्राप्तकर अपने देश का नाम उन्होंने प्रतिभा के बल पर रोशन किया। जीवन की प्रतिकूलताओं से घबराकर कर्महीन हो जाने पर व्यक्ति निराश होकर अवसादग्रस्त हो जाता है, जबकि उनका सामना साहस से करते हुए निरंतर कर्मरत रहने पर एक दिन दुर्भाग्य, सौभाग्य में बदल जाता है।