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पूर्ण सत्य जाने बिना प्रतिक्रिया न दें

7 वर्ष पहले
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एक युवक सीढ़ियों से गिरकर घायल हो गया। उसके पिता तत्काल उसे लेकर अस्पताल गए। वहां आवश्यक जांच के बाद पता चला कि युवक के शरीर में तीन-चार जगह गंभीर फ्रेक्चर है। ऑपरेशन की आवश्यकता देखते हुए सीनियर डॉक्टर को बुलाया गया। उन्हें आने में थोड़ी देर लगी। यह देख युवक के पिता क्रोध से अाग बबूला हो गए। कुछ देर तक तो नर्स व अन्य डॉक्टरों पर नाराज होते रहे। फिर जब सीनियर डॉक्टर का आगमन हुआ तो युवक के पिता उनसे लड़ने लगे। उन्होंने कहा, ‘आप लोगों के लिए मरीज इंसान नहीं, मशीन होता है। जब सुविधा हुई तब आकर इलाज करेंगे। मेरे बेटे की हालत गंभीर है। यदि उसे कुछ हो गया, तो मैं आपको छोड़ूंगा नहीं।’ डॉक्टर ने बड़ी ही शांति से उत्तर दिया, ‘आप धैर्य रखिए। मुझसे जितनी जल्दी संभव हो सका, मैं आया और आपके बेटे को भी कुछ नहीं होने दूंगा।’ इसके बाद भी युवक के पिता का डॉक्टर को कोसना जारी रहा।
बहरहाल, ऑपरेशन सफल रहा। बाहर आकर डॉक्टर ने युवक के पिता को यह सूचना दी और शेष बातें नर्स से पूछने का कहकर निकल गए। यह देखकर युवक के पिता ने पुन: रोष जाहिर किया। तब नर्स ने उन्हें बताया कि सीनियर डॉक्टर के युवा पुत्र का एक दिन पूर्व ही सड़क दुर्घटना में देहांत हुआ है और आज उसका क्रिया-कर्म होने के कारण वे ऑपरेशन में विलंब से पहुंचे थे। युवक के पिता को यह सुनकर अपने व्यवहार पर अत्यधिक ग्लानि हुई। सार यह है कि जब कोई पूर्णत: हमारी अपेक्षा के अनुकूल काम न करे तो उसे गलत समझने के पहले उसके विषय में पूरा सच जान लें, अन्यथा जल्दबाजी में किसी निष्कर्ष पर पहुंचकर प्रतिक्रिया देने से हम स्वयं भी दु:खी होते हैं और सामने वाले को भी कष्ट पहुंचाते हैं।