ज्ञान की शोभा सादगी में होती है

8 वर्ष पहले
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कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रेसीडेंट कॉलेज में प्रथम दिन जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपनी कक्षा में विद्यार्थी के रूप में पहुंचे तो वहां का दृश्य देखकर हैरान रह गए। वहां के अधिकांश लड़के अंग्रेजी वेशभूषा (कोट और पतलून) में थे। कुछ मुस्लिम लड़के भी थे, जो पायजामा पहने हुए थे और सिर पर टोपी थी। ये मदरसे के छात्र थे और एफ.ए. करने के लिए प्रेसीडेंट कॉलेज में पढ़ते थे। इन लड़कों का उपस्थिति रजिस्टर अलग रखा जाता था। अंग्रेजी वेशभूषा वाले लड़के इन मुस्लिम लड़कों को हिकारत की दृष्टि से देखते थे और उनका उपहास भी करते थे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद की वेशभूषा लगभग मुस्लिम लड़कों जैसी ही थी। अध्यापक ने हाजिरी के लिए एक-एक कर सबका नाम पुकारा लेकिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद का नाम नहीं पुकारा गया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने स्थान पर खड़े हुए। लड़के उनकी ग्रामीण पोशाक देखकर हंसने लगे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद बोले, 'सर! आपने मेरा नाम नहीं पुकारा। मुझे अपना रोल नंबर मालूम नहीं है।' अध्यापक ने उन पर एक दृष्टि डाली और रजिस्टर बंद करते हुए बोले, 'रुको, मैंने अभी मदरसे के छात्रों की उपस्थिति नहीं लगाई है।' डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा, 'सर! मैं मदरसे का छात्र नहीं हूं। मैं बिहार से आया हूं और मेरा नाम अभी-अभी लिखा गया होगा।' अध्यापक ने उनका नाम पूछा। जैसे ही उन्होंने 'राजेंद्र प्रसाद' कहा, अध्यापक बोले, 'ओह! तो तुम ही राजेंद्र प्रसाद हो, जिसने कलकत्ता विश्वविद्यालय की एंट्रेंस में टॉप किया है।' संकोची राजेंद्र बाबू ने कुछ न बोलते हुए सिर झुका लिया, लेकिन उपहास करने वाले छात्रों की दृष्टि शर्म से झुक गई। उनके मन में राजेंद्र बाबू की योग्यता के प्रति सम्मान भाव जाग गया। वेशभूषा से किसी की योग्यता को नहीं मापा जा सकता। वस्तुत: ज्ञान, सादगी में ही शोभा पाता है।