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विपरीत स्थिति में धैर्य से मिलती है सफलता

6 वर्ष पहले
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ठेकेदार ने मजदूरों को हुक्म दिया, ‘यह गाड़ी आज मंदिर तक पहुंच जानी चाहिए। ध्यान रखें भगवान की मूर्ति खंडित न हो जाए। कल मूिर्त की स्थापना है।’ मजदूर सामान सहेजकर गाड़ी में बैठ गए। गाड़ी में भगवान की मूिर्त के साथ संगमरमर की टाइल्स भी ले जाई जा रही थीं, जो मंदिर के फर्श पर लगाई जानी थीं। मजदूर अपनी बातचीत में मशगूल हो गए। इधर, टाइल्स और भगवान की मूिर्त के मध्य संवाद होने लगा। टाइल्स ने भगवान की मूिर्त से कहा, ‘भाई! ईश्वर ने यह पक्षपात क्यों किया? तुम भी पत्थर हो और मैं भी पत्थर हूं। एक ही खदान में हमारा जन्म हुआ। अब हम दाेनों एक ही मंदिर में लगाए जाएंगे, लेकिन तुम्हारी पूजा होगी और मैं लोगों के पैरों तले कुचली जाऊंगी। यह पक्षपात नहीं तो क्या है?’
यह सुनकर मूिर्त बोली, ‘नहीं बहन! तुम बात को समझो कि ऐसा क्यों हुआ? जब हम सभी को तराशा जा रहा था तो तुम वे प्रहार सहन नहीं कर सकी और टूट गईं। मैं हर प्रहार को सहन करता गया। कभी मुझ पर भगवान की आंखें बनाई गईं, कभी नाक, कभी कान तो कभी हाथ और पैर बने। करोड़ों चाेटें सहने के बाद मैंने भगवान की मूिर्त का सुंदर रूप ग्रहण किया, इसलिए मैं पूजने योग्य हो गया। तुम चोट सह न सकी, अत: खंडित होने के कारण फर्श पर लगाने योग्य मानी गई।’ मूिर्त का त्याग देख टाइल्स ने श्रद्धा में सिर नवा दिया। कथा का अर्थ यह है कि प्रतिकूल परििस्थति में विचलित न होने पर एक दिन अनुकूलता प्राप्त हो ही जाती है। बस, जरूरत धैर्य और आत्मविश्वास रखने की होती है।