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दार्शनिक ने दिखाई शांति की आसान राह

6 वर्ष पहले
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वह आज की दुनिया का सफल इंसान था। उसके पास पैसा, नाम, शोहरत सभी कुछ था। घर में स्नेहमयी, समझदार पत्नी और बच्चे थे। किसी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन फिर भी वह सदा अशांत बना रहता था। जरा-सा मन के विपरीत हो जाए तो क्रोध आ जाता था। उसके मन के विपरीत करने वाला उसके लिए घृणा का पात्र हो जाता था। पर्याप्त धन होने के बावजूद चाह बनी रहती थी। एक दिन उसने सुना कि मन की उलझने हल करने में माहिर दार्शनिक उसके शहर में आ रहे हैं। वह अपनी समस्या लेकर उनके पास पहुंचा। दार्शनिक ने उसकी सभी बातें सुन लीं और फिर एक ओर जल रहे अलाव में लकड़ियां डालने लगे। आग तेज होती गई।
वह दार्शनिक से कुछ सुनना चाहता, किंतु वे मौन थे। कुछ देर बाद वह बोला, ‘मैं बड़ी आशा लेकर आया हूं। आप मुझे मार्ग दिखाइए।’ तब दार्शनिक ने कहा, ‘भाई! मैं आपको मार्ग ही दिखा रहा था। देखो, इस आग की तरह हर इंसान के भीतर आग होती है।’ यदि उसमें स्नेह व सद्‌भाव की आहुति दोगे तो वह आनंद देती है। कपट और दुर्भाव की आहुति देने पर वह कष्ट देती है। आप भीतर की आग में रात-दिन क्रोध, लोभ, मोह की लकड़ियां डालकर अपने लिए अशांति भड़का रहे हैं। आप अंतरात्मा में पुनीत भावों को स्थान दीजिए। फिर शांति सहजता में ही मिल जाएगी।’ दार्शनिक के जवाब ने उसकी समस्या हल कर दी। शांति, अंतस की चीज है, वह बाहरी वस्तुओं से प्राप्त नहीं होती, इसलिए अपना मन तामसिक विचारों से मुक्त रखना चाहिए।