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कल्पेश याग्निक का कॉलम: क्यों हम सभी को जानना अनिवार्य है कि सुप्रीम कोर्ट में सर्वोच्च स्तर पर कैसा संघर्ष हुआ?

कल्पेश याग्निक | Last Modified - Nov 18, 2017, 08:50 AM IST

न्याय, अंतिम सत्य बना रहे, असंभव है। किन्तु बनाना ही होगा।
  • कल्पेश याग्निक का कॉलम: क्यों हम सभी को जानना अनिवार्य  है कि सुप्रीम कोर्ट में सर्वोच्च स्तर पर कैसा संघर्ष हुआ?
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    कल्पेश याग्निक।

    सुप्रीम कोर्ट अंतिम सत्य है।
    किन्तु अंतिम सत्य पर यदि अविश्वास, संदेह और झूठ का वातावरण बनने लगे - तो क्या होगा? ऐसा ही हो रहा है।
    स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने अपने न्यायिक आदेश में ऐसा कहा है। और स्पष्ट किया है कि ‘मेजेस्टी ऑफ लॉ’ तथा ‘डिग्निटी ऑफ कोर्ट’ को धक्का पहुंचा है। इसे सुधारने के लिए हरसंभव प्रयास किए जाएंगे।
    आखिर ऐसा क्या हो गया?
    जो राष्ट्र के सामने है - वह तो सार्वजनिक, सर्वज्ञात है। कि लखनऊ के एक मेडिकल कॉलेज -प्रसाद इन्स्टीट्यूट आॅफ मेडिकल साइन्सेज़- पर लगी रोक के बाद घटे नाटकीय और रहस्यमय घटनाक्रम में न जाने क्या-क्या कहा गया, क्या-क्या नहीं हुआ। अंतत: उस मेडिकल कॉलेज की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट जजों पर आरोप लगा दिए गए। जिनमें चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा का नाम भी लिया गया।
    ऐसा भारतीय इितहास में पहली बार हुआ।
    चीफ़ जस्टिस पर आरोप पहली बार नहीं लगे हैं। किन्तु ऐसा पहली बार हुआ कि चीफ़ जस्टिस के बाद वरिष्ठता में दूसरे क्रम के जज ने इन आरोपों को ‘अत्यंत गंभीर’ करार देते हुए, स्वयं एक 5-जजों की संविधान पीठ बनाने का ‘न्यायिक’ आदेश जारी कर दिया! और, कहा कि याचिका में चीफ़ जस्टिस को इस केस से दूर रखने की बात की गई है!
    फिर छिड़ा सर्वोच्च स्तर पर संघर्ष।
    हम सभी जानते हैं कि फिर चीफ़ जस्टिस ने नई संविधान पीठ बना दी। दूसरे क्रम के वरिष्ठ जज, जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर का ‘न्यायिक’ आदेश असंवैधानिक घोषित कर दिया।
    और तय हो गया कि चीफ़ जस्टिस ही सर्वोच्च हैं। उन पर आरोप लगनेे से कुछ नहीं होगा।
    केस ख़त्म।
    राष्ट्रव्यापी संदेह शुरू।
    इसलिए, हम साधारण भारतीय नागरिकों को इसे जानना व समझने का प्रयास करना आवश्यक है। बल्कि अनिवार्य है।
    निम्न प्रश्नों के माध्यम से कुछ तो समझ में आ ही सकता है :


    प्र.1 -क्या आरोप लगने के बाद भी चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा स्वयं केस सुन सकते हैं?

    उत्तर- चूंकि कोर्ट की बात हो रही है - तो कानून के आधार पर ही उत्तर आएगा। भले कानून अंधा हो। जी, हां। चीफ़ जस्टिस पर चाहे जो आरोप हो, वे स्वयं उस केस को सुनने में सक्षम और स्वतंत्र हैं।
    क्यों? क्योंकि पहले से मौजूद सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसले चीफ़ जस्टिस को पूरा अधिकार देते हैं। चीफ़ जस्टिस ए.एम. अहमदी पर गंभीर आरोप व अकल्पनीय शब्दों का प्रयोग करने वाली याचिका लगी थी। चीफ़ जस्टिस वाय वी चन्द्रचूड़ पर भी आरोप थे। 1991 में वीरास्वामी विरुद्ध यूनियन ऑफ इंडिया केस में 5 जजों की संविधान पीठ ने चीफ़ जस्टिस को असीम अधिकार दिए थे।
    किन्तु कानूनी बातों से आगे है व्यावहारिक बिन्दु।
    सारी याचिकाओं को खारिज कर, इस विवाद को ख़त्म करते हुए इस केस में अंतिम सुनवाई कर रही 3 जजों की बेंच ने अच्छा बिन्दु उठाया है। कि कोई भी जज, ख़ुद का जज नहीं हो सकता। यही प्रचलित है। और सही है। किन्तु ये ऐसे ही लागू नहीं किया जा सकता।
    यानी कोई जज किसी केस की सुनवाई कर रहा हो/चुका हो - इसलिए वो ‘पार्टी’ बन गया। इसलिए वो नहीं सुनना चाहिए। बल्कि यदि जज की ‘रुचि’ हो या ‘रुझान’ हो - तो वह केस नहीं सुनना चाहिए।
    चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा कानूनी लड़ाई में याचिका लगाने वालों के वकील प्रशांत भूषण को हरा चुके हैं। क्योंकि भूषण ने कहा था उनका नाम सीबीआई की एफआईआर में है! जब उद्वेलित-नाराज़ चीफ़ जस्टिस ने एफआईआर पढ़कर सुनाने को कहा - तो भूषण नहीं बता पाए कि नाम कहां है? बस!
    जब कोई दलाल कह दे कि उसने किसी को ढूंढा है जो उसके पक्ष में फैसला करवा देगा - इससे वे सारे जज दोषी तो दूर, आरोपी भी नहीं बन सकते।
    किन्तु एक व्यावहारिक पहलू और है
    और कुछ कड़वा है।
    प्रसाद मेडिकल कॉलेज के बीपी यादव, पलाश यादव वगैरह ओडिशा हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस कुद्दुसी से जो आश्वासन लाए थे, उसमें भारी भ्रष्टाचार, घूस, लेन-देन हुआ ही होगा - इसका प्रमाण यह है कि जब केन्द्र सरकार ने इस काॅलेज को मंजूरी नहीं दी - तो सुप्रीम कोर्ट गए। जहां उस वर्ष (2017-18) की मंजूरी जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने भी नहीं दी। किन्तु अगले वर्ष (18-19) के लिए मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, कॉलेज का इंस्पेक्शन करे - यह कहा। जब कॉलेज को सुनने के बाद काउंसिल ने फिर मंजूरी नहीं दी - तो प्रसाद वाले अपील में सुप्रीम कोर्ट गए। किन्तु रिटायर्ड जस्टिस कुद्दुसी के कहने पर अपील वापस ले ली! और इलाहाबाद हाई कोर्ट गए। वहां स्टे पाने में सफल हो गए!
    कैसे?
    और जिस 2 करोड़ की बैंक गारंटी की जब्ती कर एनकैशमेंट का सरकारी आदेश था, उसे भी रुकवा लिया।
    फिर, काउंसिल नहीं माना।
    18 सितंबर 2017 को जस्टिस मिश्रा की बेंच ने केस खारिज कर दिया था। किन्तु बैंक गारंटी एनकैश करने पर रोक हटा दी थी।
    यहां कड़वी बात यही है कि अचानक इलाहाबाद हाईकोर्ट जाकर राहत पा लेने का अर्थ, अनर्थ है। किन्तु एफआईआर में किसी मौजूदा जज का नाम न आना इसलिए आश्चर्यजनक नहीं है, चूंकि संवैधानिक रूप से मना है।
    1991 में 5 जजों की संविधान पीठ ने तय किया था कि हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस और जज तथा सुप्रीम कोर्ट के जज पर एफआईआर, बिना चीफ़ जस्टिस आॅफ इंडिया की सहमति व मंजूरी के नहीं हो सकती।
    चीफ़ जस्टिस पर एफआईआर, बिना राष्ट्रपति की सहमति व मंजूरी के नहीं हो सकती।


    प्र. 2-रेक्यूज़ क्या है?
    उत्तर-रेक्यूज़ कानूनी भाषा में बहुत ही प्रचलित है। केस से अलग हटने को रेक्यूज़ करना कहते हैं।
    चीफ़ जस्टिस को इस मेडिकल कॉलेज केस से रेक्यूज़ करने और सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड चीफ़ जस्टिस की अध्यक्षता में स्पेशल जांच टीम बनाने की मांग से ही इतना बड़ा विवाद खड़ा हुआ।
    यही नहीं, जिस 2-जजों की बेंच ने अंतिम, निर्णायक आदेश सुनाया उसे सुनाने वालों में एक जस्टिस एएम खानविलकर भी थे। उन्हें भी याचिका लगाने वालों ने रेक्यूज़ करने की मांग रखी। क्योंकि वे भी प्रसाद कॉलेज का मामला सुनाने वाली बेंच में रहे थे।
    रोचक यह भी है - या पता नहीं, दर्दनाक यह भी है कहें - कि याचिका वालों के इन्हीं वकील ने जोड़ा - ‘हालांकि जस्टिस खानविलकर पर कोई आरोप नहीं है।’
    व्यावहारिक प्रश्न यह है कि जब एफआईआर में किसी जज का नाम नहीं है। ऐसे में चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा का नाम तो आरोपी के रूप में लिया गया - जबकि जस्टिस खानविलकर को आरोपी नहीं कहा गया? भूषण यहां जज कैसे बन गए? कि खानविलकर आरोपी नहीं हैं?

    और यदि आरोपी हैं ही नहीं, तो रेक्युज़ल क्यों मांगा?


    प्र. 3-क्या जस्टिस चेलमेश्वर ने 5 जजों की बेंच बनाकर सही किया?
    उत्तर- जस्टिस चेलमेश्वर ने ओडिशा के रिटायर्ड जस्टिस कुद्दुसी और ओडिशा के दलाल बिस्वनाथ अग्रवाल के प्रभाव और घूस के सीबीआई के सुबूतों को ‘गंभीर’ माना। जो बहुत अच्छा और न्यायपूर्ण कदम था। किन्तु, वे इतने अनुभवी और वरिष्ठ होने के बावज़ूद स्वयं 5 जजों की संविधान पीठ गठन करने का आदेश क्यों दे गए? जो उनका कानूनी/न्यायिक अधिकार ही नहीं है। फिर, व्यावहारिक रूप से भी, यदि सारे जज, गंभीर कहकर, बेंच का गठन करने लगे - तो अराजकता फैल जाएगी।
    उधर, याचिका लगाने वाली संस्था ने हूबहू शब्दावली वाली, हूबहू मांग, वही कार्रवाई का अनुरोध करने वाली याचिका जस्टिस चेलमेश्वर के समक्ष जानबूझकर लगा दी - जो कि अन्य कोर्ट में जस्टिस एके सीकरी के समक्ष पेंडिंग थी।
    या तो वकील ने छुपाया। या जज ने अनदेखा किया। किन्तु न्याय की अवमानना निश्चित हुई। इसे सुप्रीम कोर्ट ने ‘फोरम-शॉपिंग’ का निश्चित केस माना।
    प्रक्रिया का पालन करते हुए यदि जस्टिस चेलमेश्वर इसे गंभीर बताते हुए याचिका वालों को कहते कि वे चीफ़ जस्टिस से नई बेंच का अनुरोध करें - तो फौरन वकील, जस्टिस सीकरी की कोर्ट में पहले से है, यह कहते। या, कौन जाने, नहीं भी कहते।
    चूंकि उन्हें तो जस्टिस चेलमेश्वर ही चाहिए थे। चूंकि वे ही ऐसे जज थे, जो इस घोटाले में न्यायमूर्तियों की भूमिका आने से आहत/सतर्क थे!


    प्र. 4-फोरम शाॅपिंग क्या है?
    उत्तर- यह कानून में बहुत डरावना शब्द है। इसका अर्थ है कि वकील या मुवक्किल, अपने पक्ष में फैसला मिल सके, ऐसे किसी तयशुदा जज या कोर्ट रूम/बेंच के सामने केस लिस्ट करवाने की कोशिश करें।
    व्यावहारिक रूप से यह और भी वीभत्स है। चूंकि इसका दूसरा अर्थ यह हुआ कि जिस जज ने वैसा केस सुना, वह ‘उपलब्ध’ है। इस केस में, अंतिम रूप से इसे फोरम-शॉपिंग (जिसे बेंच या ज्यूरिस्डिक्शनल शॉपिंग या फोरम-हंटिंग भी कहते हैं) माना गया।
    निश्चित ही, यह दुर्भाग्यपूर्ण रूप से जस्टिस चेलमेश्वर के लिए अधिक दु:खदायी और ग़लत है। क्योंकि वकीलों का तो काम ही केस लड़ना है - यहां लड़ें या वहां लड़ें। यही कारण है कि चीफ़ जस्टिस ने जब कहा कि इतने मनगढ़ंत और आपत्तिजनक आरोप पर कन्टेम्प्ट लगा देंगे - तो भूषण ने आराम से कहा - लगा दीजिए!
    वो तो चीफ़ जस्टिस ताड़ गए। इसलिए बोले - आप इसके योग्य नहीं।


    प्र. 5-हमारे लिए इस पूरे घटनाक्रम में सीखने के लिए क्या है?
    उत्तर-बहुत सारी सीख हैं :
    जज भी अंतत: मनुष्य हैं।
    जबकि उन्हें केवल जज ही रहना चाहिए। विवशता है। नाम ही जिनका ‘जस्टिस’ हो, जिन्हें ‘न्यायमूर्ति’ कहते हों - वे साधारण मनुष्यों की तरह यदि प्रतिष्ठा, अहम, अहंकार या अधिकार की लड़ाइयां लड़ने लगेंगे - तो हम साधारण मनुष्यों को न्याय कैसे देंगे?
    * सबसे बड़ी सीख है - हमें कोई न कोई देख रहा है। वकील, मुवक्किल, जज कोई हो। मकतूल, क़ातिल कोई हो। कोई न कोई आंख, हम पर है ही।
    किन्तु, न्याय अंतिम सत्य है। चूंकि हम अपना दुखड़ा अंतिम रूप से न्यायालय लेकर ही जाते हैं।
    न्याय, अंतिम सत्य बना रहे, असंभव है। किन्तु बनाना ही होगा।
    ‘सत्यमेव जयते’ केवल न्यायालयों की दीवारों पर लिखा वाक्य बनकर न रह जाए, हमसे कहीं अधिक, यह जिम्मेदारी न्यायमूर्तियों की है।

    (लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।)

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Web Title: Kalpesh Yagnik Column On Chief Justice Controversy
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