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अमीबायसिस

5 वर्ष पहले
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अमीबायसिस ऐसी बीमारी है, जो हर घर में किसी न किसी को हो सकती है। यह अमीबा की एक प्रजाति के कारण होती है, जो पेट में पाई जा सकती है। खराब पानी और साफ-सफाई के अभाव में यह पेट में जगह बना लेती है। यह बीमारी इतनी खतरनाक हो सकती है कि मौत भी हो सकती है।

अमीबायसिस को एंटअमीबायसिस भी कहते हैं। एंटअमीबा हिस्टोलिटिका एक माइक्रोआॅर्गेनिज्म है, जो अपना जीवन पैरासाइट (परजीवी) के रूप में बिताता है। इसी इंटेस्टाइनल प्रोटोजोआ पैरासाइट के कारण एमीबायसिस रोग होता है। ये माइक्रोस्कोपिक आॅर्गेनिज्म अमीबा की एक प्रजाति है, जो फाइलम प्रोटोजोआ के तहत आता है। चूंकि यह अमीबा की एक प्रजाति है, इसलिए इसके द्वारा जो रोग उत्पन्न किया जाता है, उसे अमीबायसिस कहते हैं।

यह एक प्रकार का संक्रमण है, जो सूक्ष्म परजीवी एंटअमीबा हिस्टोलीटिका द्वारा फैलता है। इस बीमारी का समय पर इलाज कराना बेहद जरूरी है, नहीं तो रोगी की जान भी जा सकती है। वर्तमान में ई. हिस्टोलीटिक के संक्रमण से पूरी दुनिया में 48 करोड़ लोग ग्रस्त हैं। इस बीमारी के कारण हर वर्ष पूरी दुनिया में 40,000 से 1,10,000 लोगों की मौत हो जाती है। जानते हैं, क्यों होता है अमीबायसिस।
कारण ­: इस बीमारी के होने का प्रमुख कारण साफ-सफाई का अभाव होना है। दूषित भोजन, पानी और गंदी जगह मल-मूत्र त्यागने के कारण सूक्ष्म परजीवी ई. हिस्टोलीटिका के सिस्ट हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और इंटेस्टाइन यानी हमारी आंतों को संक्रमित कर देते हैं। इस संक्रमण को अमीबिक डायरिया या अमीबिक कोलाइटिस कहते हैं, लेकिन कई बार ऐसा भी होता है जब ये परजीवी इंटेस्टाइनल वॉल यानी आंतों की दीवार में छेदकर रक्त प्रवाह में पहुंच जाते हैं। एक बार रक्त प्रवाह में पहुंचने के बाद ये परजीवी हमारे लिवर, हार्ट, लंग्स और ब्रेन कहीं भी पहुंच सकते हैं और वहां के टिश्यू को क्षतिग्रस्त कर सकते हैं। इस वजह से उन अंगों में घाव बन जाता है। लिवर के संक्रमण को अमीबिक लिवर एबसेसेस कहते हैं। इंटेस्टाइन के बाद सबसे ज्यादा ये लिवर को ही संक्रमित करते हैं। ई. हिस्टोलीटिका का संक्रमण हार्ट, लंग्स और ब्रेन में कम देखने को मिलता है।

लक्षण : अमीबायसिस के लक्षण के दिखाई देने में कुछ दिनों से लेकर हफ्तों तक का समय लग सकता है। फिर भी आमतौर पर इसके लक्षण दो से चार सप्ताह के भीतर दिखाई देने लगते हैं। इसके होने पर पेट में ऐंठन व दर्द होता है। संक्रमण होने पर रोगी को डायरिया और डिसेंट्री की शिकायत भी हो जाती है। इस संक्रमण के गंभीर रूप धारण करने पर शौच के साथ खून भी आने लगता है। जब अमीबा का जीवाणु या पैरासाइट लिवर में प्रवेश कर जाता है, तब पेट में दाहिनी तरफ ऊपर की ओर पसलियों के अंदर बहुत दर्द होता है और तेज बुखार हो जाता है। इस कारण से भूख कम हो जाती है और उल्टियां भी होने लगती हैं।

जांच : अमीबायसिस का पता लगाने के लिए रोगी के स्टूल सैंपल की जांच की जाती है। स्टूल सैंपल के अलावा डॉक्टर रोगी के लिवर फंक्शन की भी जांच करते हैं और पता लगाते हैं कि कहीं लिवर को कोई नुकसान तो नहीं पहुंचा है। अंदरूनी अंगों को हानि पहुंचने की संभावना पाए जाने पर रोगी का अल्ट्रासाउंड या सीटी स्कैन किया जाता है। जरूरत पड़ने पर नीडल की सहायता से संक्रमण के कारण लिवर में होने वाले घाव की जांच की जाती है। लिवर में फोड़ा या सिस्ट कभी- कभी फटकर पेट, फेफड़ों और हृदय की झिल्ली (यानी पेरिकार्डियम) में चला जाता है और यह तकलीफ खतरनाक भी हो सकती है। डॉक्टर इंटेस्टाइन या कोलोन टिश्यू में परजीवी की उपस्थिति का पता लगाने के लिए कोलोनोस्कोपी करते हैं।

उपचार : अमीबायसिस का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि रोगी को किस तरह का संक्रमण है। सामान्य संक्रमण होने पर डॉक्टर 10 दिन की दवा देते हैं। अगर यह परजीवी लिवर में फोड़ा पैदा कर दे तो 15-20 दिन तक दवा दी जाती है। इसमें यदि पस पड़ जाए तो उसे सिरिंज की सहायता से निकाल लिया जाता है। कभी-कभी आंतों में अमीबिक अल्सर फट जाने से सारे पेट में संक्रमण फैल जाता है, और ऐसी अवस्था में सर्जरी करनी पड़ सकती है। अमीबायसिस से बचाव के लिए निम्न बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। टॉयलेट से आने और बच्चों के डाइपर बदलने के बाद गर्म पानी से हाथों को धोएं। टॉयलेट और टॉयलेट सीट की नियमित सफाई करें। तौलिया या फेसवाशर्स को शेयर करने से बचें।

फैक्ट : अमीबायसिस लोगों की आंतों में कई वर्षों तक रह सकता है। जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम है, जरूरी नहीं कि उनमें इसके लक्षण नजर आएं।

डॉ जे.सी. विज
बीएलके सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल गेस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट, नई दिल्ली
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