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सिरोसिस ऑफ लिवर और इलाज

हैपेटाइटिस बी और सी तथा शराब सेवन के कारण कई लोगों में सिरोसिस ऑफ लिवर की शिकायत हो जाती है।

Dainik Bhaskar

Jul 29, 2015, 03:43 AM IST
knowledge bhaskar by dr pradeep gadge
हैपेटाइटिस बी और सी तथा शराब सेवन के कारण कई लोगों में सिरोसिस ऑफ लिवर की शिकायत हो जाती है। कई बार लक्षण मरीज में नजर नहीं आते हैं, कई बार यह पैरों में सूजन के रूप में उभरते हैं। इसमें कई मरीज बढ़ी हुई ब्लड शुगर के साथ आते हैं, तब इसके लक्षण पता चलते हैं। कई बार मरीजों का पेट फूल जाता है और उसमें पानी भर जाता है। इसमें इंफेक्शन होने की बहुत ज्यादा आशंका रहती है। कई बार सिरोसिस ऑफ लिवर कैंसर में तब्दील हो जाता है।
पिछले दिनों एक मामला आया, इसमें मरीज के खून में प्लेटलेट काउंट कम थे। 65 साल के इस मरीज को 2 साल पहले बुखार भी आया था। वह अपने फैमिली डॉक्टर के यहां गए। वायरल बुखार के कारण प्लेटलेट कम होने से उनके डॉक्टर को लगा कि यह वायरल फीवर के कारण हो सकता है। अगले सात दिनों में मरीज की तबीयत ठीक हो गई। उनके प्लेटलेट काउंट 80000 ही थे। फिर भी उनमें कोई और लक्षण नहीं थे। इसलिए उन्होंने इसकी चिंता नहीं की और डॉक्टर के यहां नहीं गए। पिछले दो सालों में जब भी उनका सीबीसी (ब्लड काउंट चैक) कराया तो प्लेटलेट काउंट कम ही निकला। एक साल पहले इस मरीज ने हेमटोलॉजिस्ट (रक्त विशेषज्ञ) से कंसल्ट किया। परीक्षण व जांच करने के बाद कहा गया कि वे सामान्य हैं और किसी उपचार की कोई जरूरत नहीं है। पिछले दिनों यह मरीज मेरे पास आया। उनकी ब्लड शुगर बढ़ी हुई थी। उनके पैरों में भी सूजन बनी हुई थी। दो हफ्ते में उनकी शुगर काबू में लाई जा सकी, लेकिन उनके पैरों की सूजन बनी हुई थी। एक बार फिर से उनकी जांच की गई। जब सारी रिपोर्ट आई तो यह देखने में आया कि इस मरीज का लिवर ठीक से काम नहीं कर रहा था। वह असामान्य था। यह भी देखा गया कि उनके शरीर में अल्बूमिन की मात्रा घट चुकी थी और इसी कारण से उनके पैरों में सूजन आ रही थी। तब उनसे सोनोग्राफी कराने को कहा गया। उनको सिरोसिस ऑफ लिवर निकला। उनके पैरों में सूजन और प्लेटलेट काउंट कम होना इसी की निशानी थी।

सिरोसिस ऑफ लिवर में लिवर ठीक से काम नहीं करता है, क्योंकि इसमें लंबे समय से नुकसान होता रहता है। यह बीमारी धीरे-धीरे कुछ वर्षों में उभरती है। शुरुआत में इसके कोई लक्षण नजर नहीं आते हैं। जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, मरीज को थकान, कमजोरी, चिढ़चिढ़ाहट, पैरों में सूजन, त्वचा का पीला होना, पेट में पानी की मात्रा ज्यादा होना, त्वचा पर मकड़ी के समान चकत्ते उभरना और प्लेटलेट काउंट घट जाना। पेट में जो पानी भर जाता है, उसमें इंफेक्शन हो जाता है। इसके अलावा दूसरे कॉम्प्लिकेशन में हेपेटिक एनसेफेलोपैथी है। इसमें आहार नली और पेट की नसों में से ब्लीडिंग भी हो सकती है। कई बार यह लिवर कैंसर के रूप में सामने आता है। हेपेटिक एनसेफेलोपैथी में कई बार भ्रम होता है, क्योंकि मरीज इसमें बेहोश हो जाता है।

सिरोसिस ऑफ लिवर शराब, हैपटाइटिस बी, हैपटाइटिस सी के कारण हो सकता है। यदि कुछ सालों तक कोई व्यक्ति प्रतिदिन दो से तीन ड्रिंक लेता है तो उसे सिरोसिस की तकलीफ हो सकती है। चूंकि उक्त मरीज शराब नहीं पीता था, लेकिन उनको सिरोसिस नॉन अल्कोहोलिक फैटी लिवर बीमारी के कारण हुआ।

क्या है फैटी लिवर?
शराब पीने वाले अधिकांश लोगों का फैटी लिवर (लिवर का आकार बढ़ना) की तकलीफ रहती है। अन्य लोगों में कुछ औषधियों या फिर मेटाबोलिक डिसऑर्डर के कारण होती है। कई मामलों में डॉक्टर भी नहीं समझ पाते हैं कि शराब न पीने के बाद भी मरीज का लिवर बढ़ कैसे गया है। लेकिन यह ज्यादा कॉलेस्ट्रॉल, मोटापा और टाइप 2 डायबिटीज के कारण होता है।

लिवर बढ़ा होना सामान्य है?
अधिकांश लोगों में बढ़ा हुआ लिवर तकलीफ नहीं पहुंचाता है। हालांकि कुछ लोगों में इसका आकार बढ़ जाना गंभीर तकलीफ का रूप ले लेता है। इसे एनएएफएलडी कहते हैं यानी नॉन अल्कोहोलिक स्टेटोहेपटाइटिस (नैश)। इस तरह की परिस्थिति में लिवर के सेल्स में अतिरिक्त चर्बी रहती है, कई बार इसमें सूजन या सिरोसिस या फिर लिवर कैंसर होने की आशंका रहती है।

सिरोसिस ऑफ लिवर में उपचार

किसी के लिवर में कितना नुकसान हुआ है, सिरोसिस का इलाज उस पर आधारित रहता है। पहला मकसद लिवर के खराब टिश्यू को हटाना होता है। अस्पताल में भर्ती भी होना पड़ सकता है। फिर इन विकल्पों पर काम किया जाता है।

> यदि लिवर शराब के कारण खराब हुआ है तो सबसे पहले इसे नियंत्रित किया जाता है। यदि कोई शराब एकदम नहीं छोड़ पाता है तो उसे नशा मुक्ति उपचार कराने को कहा जाता है।
> बिना शराब के किसी के लिवर के आकार बढ़ जाने पर शुगर को कंट्रोल किया जाता है।
> हेपटाइटिस से होने वाले सिरोसिस में ऐसी दवाएं देते हैं, जो लिवर सेल्स को नुकसान से बचा सके।
> कुछ तरह के सिरोसिस ऑफ लिवर में उपचार धीमी गति से चलता है, उदाहरण के लिए जिन लोगों को प्राइमरी बायलियरी सिरोसिस हो उनमें।
> अन्य इलाजों में इन लक्षणों से राहत मिल सकती है, जैसे खुजली, थकान, दर्द आदि। पोषक तत्व लेने को कहा जाता है, ताकि मरीज को ओस्टियोपोरोसिस से बचाया जा सके।
> कई मरीजों के पेट में पानी भरा जाता है। एडेमा और एससिटेस को कम नमक वाले आहार से काबू पाया जा सकता है। यदि पानी की मात्रा अधिक है तो इसे निकाला जाता है, ताकि शरीर में से भार को कम किया जा सके।
> ब्लड प्रेशर की दवाओं से उन नसों पर आने वाले दवाब को नियंत्रित किया जाता है, जो लिवर में रक्तापूर्ति करती हैं। इससे ब्लीडिंग को रोका जा सकता है। इसे पोर्टल हायपरटेंशन कहते हैं। इसके लिए डॉक्टर नियमित रूप से एंडोस्कोपी करते हैं, जिसमें आहार नली या पेट में बढ़ी हुई नसों को देखा जाता है, जिसमें ब्लीडिंग हो सकती है।

यदि पेट की नसें बढ़ जाती हैं तो जरूरी है उपचार कराना, ताकि ब्लीडिंग को रोका जा सके। यदि आप इसमें उपचार को सहन नहीं कर पाते हैं तो आपको बैंड लेगेशन नाम की प्रक्रिया से गुजरना होता है, ताकि ब्लीडिंग को रोका जा सके। गंभीर मामलों में आपकी नसों में ट्रांसजगुलर इंट्राहेपेटिक पोर्टोसिस्टमिक शंट (टिप्स) लगाना होता है, ताकि लिवर में ब्लड प्रेशर को कम किया जा सके।
संक्रमण- इसके लिए आपको एंटीबायोटिक दी जाती है। इंफ्लूएंजा, निमोनिया या हेपटाइटिस के लिए वैक्सीनेशन देना होता है।
लिवर कैंसर की आशंका- इसमें डॉक्टर नियमित रूप से ब्लड टेस्ट और सोनोग्राफी कराने को कह सकता है।
हेपटिक एनसिफेलोपैथी- इसमें लिवर के खराब फंक्शन के कारण रक्त में जो टॉक्सिन हैं, उसे हटाने के लिए दवाएं दी जाती हैं।
लिवर ट्रांसप्लांट सर्जरी- सिरोसिस के गंभीर मामलों में जब लिवर काम करना बंद करता है तो लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है। यह एकमात्र विकल्प रह जाता है। लिवर ट्रांसप्लांट एक प्रक्रिया है, जिसमें एक स्वस्थ लिवर से खराब हो चुके लिवर को बदला जाता है। लिवर ट्रांसप्लांट अधिकांश तौर पर सिरोसिस ऑफ लिवर के मामलों में ही होते हैं। कई बार शराब से खराब हो चुके लिवर को बदलने के लिए पहले मरीज को 6 माह तक उपचार कराना होता है।
फैक्ट - पूरी दुनिया में सिरोसिस ऑफ लिवर के 57 फीसदी मामले होते हैं। इसमें से 30 फीसदी हैपेटाइटिस बी के कारण, 27 फीसदी हैपटाइटिस सी के कारण और 20 फीसदी शराब के कारण होते हैं।
डॉ. प्रदीप गाडगे
एमडी, डीपीएच, डी. डायबेटोलॉजिस्ट, एफआरएचएस (लंदन) चीफ डायबेटोलॉजिस्ट श्रेया डायबिटीज केयर सेंटर, मुंबई
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