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हर्पीस, गंभीर त्वचा रोग

5 वर्ष पहले
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हर्पीस जोस्टर यानी शिंगल्स एक ऐसी बीमारी है, जिसमें हमारी त्वचा पर पानी भरे हुए छोटे-छोटे दाने निकल आते हैं। इसमें रोगी के शरीर के एक ही हिस्से में एक ही तरफ कई दाने एक साथ ही निकल आते हैं। 40 के बाद इसकी आशंका अधिक होती है। दर्द इतना भयंकर होता है कि लगता है मानो दिल का दौरा पड़ा हो या पथरी का दर्द हो।
यह बीमारी चिकन पॉक्स के वायरस वेरिसेला जोस्टर वायरस के कारण होता है। शरीर पर एक जगह दाने निकलने पर रोगी को दर्द और बुखार हो जाता है। यह एक संक्रामक बीमारी है, इसलिए सावधानी बरतना काफी जरूरी है।

आमतौर पर यह बीमारी उसी व्यक्ति को होती है, जिसे पहले चिकन पॉक्स हो चुका होता है या फिर चिकन पॉक्स का एक्सपोजर हुआ हो। कहने का मतलब यह है कि अगर यह वेरिसेला जोस्टर वायरस पहले से ही आपके शरीर में मौजूद है तो आप इस बीमारी से ग्रस्त हो सकते हैं। चिकन पॉक्स ठीक होने के बाद यह वायरस नर्वस सिस्टम में चला जाता है और वर्षों तक वहीं सुप्तावस्था यानी डॉरमेंट स्टेज में पड़ा रहता है।

क्यों होती है- यह बीमारी क्यों उभरती है, इसका कारण स्पष्ट तो नहीं है। ऐसा माना जाता है कि जब हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है और शरीर कमजोर हो जाता है तो यह वायरस नर्वस पाथवे यानी तंत्रिका मार्गों से होता हुआ हमारी स्किन यानी त्वचा तक पहुंच जाता है। आमतौर पर यह बीमारी बढ़ती उम्र और 50 साल से अधिक उम्र वालों में काफी सामान्य है। उम्र के साथ इसका खतरा बढ़ता जाता।

कई बार एड्स, एचआईवीए कैंसर आदि होने की वजह से हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहद कमजोर हो जाती है। ऐसे में इस बीमारी के होने का खतरा बढ़ जाता है। कैंसर ट्रीटमेंट जैसे रेडिएशन या कीमोथैरेपी लेने वाले रोगियों की अंदरूनी क्षमता काफी कमजोर हो जाती है। जो लंबे समय तक स्टेरॉयड्स जैसे प्रेडनिसोन जैसी दवाइयों का सेवन करते हैं, उनमें हर्पीस जोस्टर होने का खतरा अधिक होता है।

इस बीमारी के होने पर रोगी के शरीर के एक तरफ की त्वचा पर पानी वाले दाने निकलते हैं। इस वजह से रोगी को त्वचा में खुजली या दर्द या जलन या सुन्नपन या झनझनाहट की परेशानी होती है। इतना ही नहीं जिस जगह ये दाने निकलते हैं, वहां की त्वचा बेहद संवेदनशील हो जाती है और उसे छूने पर दर्द होता है। इन दानों के निकलने के पहले रोगी को दर्द होना शुरू हो जाता है। दर्द होने के कुछ दिनों के पश्चात उस जगह की त्वचा पर लाल-लाल फुंसियां निकलनी शुरू हो जाती हैं। धीरे-धीरे इन दानों में पानी भर जाता है। इसके अलावा बुखार, जोड़ों में दर्द, सिरदर्द, थकान आदि की शिकायत भी कई रोगियों को होने लग जाती हैं। कई लोगों को रोशनी सहन नहीं होती है। फुंसियों में दर्द होना इस बीमारी का प्रमुख लक्षण है। कई रोगियों में यह दर्द काफी तेज होता है। अधिकांशत: यह दाने हमारे शरीर के ऊपरी हिस्से पर निकलते हैं। ये पीठ से छाती पर ही एक तरफ निकल आते हैं। कई बार ये दाने हमारी एक आंख या गर्दन या चेहरे के एक तरफ भी निकल आते हैं। इतना ही नहीं कुछ रोगियों में तो बिना फुंसियां निकले ही त्वचा में दर्द होने लगता है।

इस बीमारी के इलाज के लिए एंटी वायरस मेडिसिन एसाइक्लोविर दवा रोगी को दी जाती है ताकि उसके शरीर में उपस्थित वायरस नष्ट हो जाए। हर्पीस जोस्टर के इलाज के लिए मुख्य तौर पर यही दवा इस्तेमाल में लाई जाती है। इसके अलावा फैमसाइक्लोविर और वैलासाइक्लोविर दवाइयां भी रोगी को दी जा सकती हैं। इन दवाइयों के साथ रोगी को सपोर्टिव ट्रीटमेंट भी दिया जाता है। इसके तहत दानों पर लगाने के लिए लोशन या मल्हम आदि का इस्तेमाल किया जाता है। इस बीमारी के ठीक होने में दो से तीन सप्ताह यानी 10 से 20 दिन लगते हैं।
चूंकि इस बीमारी में कई बार रोगी को बहुत ज्यादा दर्द होता है तो ऐसी स्थिति में दर्द से बचने के लिए जोस्टावैक्स नामक वैक्सीन दिया जाता है। अमेरिका में 55 साल की उम्र के बाद से हर व्यक्ति को यह वैक्सीन दिया जाता है ताकि इस बीमारी से बचा जा सके। इस वैक्सीन के लेने से बीमारी होने की आशंका कम हो जाती है। इस बीमारी का समय पर इलाज नहीं कराने से इसमें बैक्टीरियल इंफेक्शन, एग्जिमा आदि की परेशानी हो सकती है।

इतना ही नहीं अगर ज्यादा दिनों तक इस बीमारी को नज़रअंदाज किया जाए तो रोगी को सर्पेटिक न्यूराल्जिया जैसी गंभीर परेशानी हो सकती है और रोगी को नर्व पेन यानी नसों में दर्द की शिकायत हो सकती है। इसे पोस्ट हर्पेटिक न्यूराल्जिया कहा जाता है, इसलिए इस बीमारी के लक्षण दिखाई देते ही इसका तुरंत उपचार कराना चाहिए नहीं तो रोगी को इन परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। खुद इलाज नहीं करना चाहिए लक्षण दिखाई देने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।

फैक्ट : अमेरिका में यह बीमारी 1992 से 2010 के बीच 40 फीसदी की दर से बढ़ी है। पिछले साल ‘संजीवनी’ सीरियल में काम करने वाले संजित बेदी की इस बीमारी से मौत हो गई थी।

डॉ. नितिन वालिया
सीनियर कंसल्टेंट डर्मेटोलॉजिस्ट, नई दिल्ली
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