क्या आप टॉप रेटेड म्युचुअल फंड में उलझ गए हैं?

5 वर्ष पहले
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केवल रेटिंग अच्छी देखकर किसी म्युचुअल फंड में पैसा लगा देना ठीक नहीं है। यह धारणा अभी तक भले ही सही मानी जाती हो, लेकिन इसके नतीजे अच्छे नहीं कहे जा सकते। जरूरी है कि आप अपनी जरूरत के अनुसार म्युचुअल फंड में पैसा लगाएं। हर वर्ष टॉप 10 रेटिंग वाले फंड का क्रम बदल जाते हैं। इसलिए पहले यह देख लें-
 
कई निवेशक बिना कुछ सोचे अच्छी रेटिंग वाले म्युचुअल फंड्स में निवेश कर देते हैं। न तो उन्हें यह पता होता है कि वे क्यों निवेश कर रहे हैं। न ही वे इसमें निहित जोखिम को जानते हैं। टैक्स सेविंग के समय अक्सर इस तरह का कदम निवेशक उठाते हैं। कुछ समय बाद जब नुकसान होने लगता है तो उन्हें समझ में आता है कि वे क्या गड़बड़ कर गए हैं। यदि ऐसा हो गया है तो आप अकेले नहीं है, जिसके साथ ऐसी गड़बड़ी हुई है, कई और भी है। कई निवेशक टॉप रेटिंग देखकर म्युचुअल फंड्स में पैसा निवेश कर देते हैं। 

वेबसाइट्स पर वे इन फंड्स की रेटिंग और ओवररेटेड रिटर्न देखकर पैसा लगा देते हैं। वेबसाइट्स पर सब आकलन और अनुमान अच्छे पक्ष के बताए जाते हैं। जहां तक जोखिम की बात है तो वह तभी सामने आती है, जब नुकसान होता है। जो इस विधा का जानकार नहीं है, उसे जोखिम समझता भी नहीं है। वह टॉप फंड्स मानकर निवेश करता है। हर रेटिंग एजेंसी का आकलन अलग होता है। हर फंड पोर्टल रेटिंग के लिए एक विशेष अवधि को चुनता है। यह जरूरी नहीं कि रिटर्न हमेशा उतना ही रहे। अध्ययन बताते हैं कि एक अवधि में प्राप्त रिटर्न कम रहता है।
 
पुराना रिटर्न या कम रिटर्न
 
यदि हम पीछे के वर्षों पर नजर डालते हैं तो टॉप स्टार रेटिंग म्युचुअल फंड में 10 हजार रु. निवेश करते हैं, जिसने 2011 में 10.7 फीसद का रिटर्न दिया है। यदि इसे पांच साल रखते हैं, कोई पैसा नहीं निकालते हैं तो यह 2016 तक 16,624 रु. का हो चुका होगा। फिर भी यह रिटर्न 3.7 फीसदी का ही होता है। औसत निवेशक केवल 3.7 फीसदी ही प्राप्त कर पाता है। इसी प्रकार से गैप 7 फीसदी प्रतिवर्ष के हिसाब का आकलन करते हैं। गैप का अर्थ यह है कि यदि निवेशक ने 2011 में 10 हजार रु. लगाए हैं तो पांच साल बाद उसे 11,992 रु. मिलते हैं। यानी 4,600 रु. केवल तालिकाओं में रहता है। क्यों इन्वेस्टमेंट रिटर्न और इन्वेस्टर रिटर्न हमेशा ही अलग होते हैं? इसलिए यह स्पष्ट हो जाता है कि पुराने रिटर्न हमेशा जारी नहीं रहते हैं। हमें पुराने प्रदर्शन के आकलन के हिसाब से निवेश नहीं करना चाहिए। हममें से कई लोग हैं, जो पैसा लगाते है और भूल जाते हैं। न ही हम समय-समय पर निवेश की समीक्षा करते हैं। चाहिए तो यह कि आयु के हिसाब से हम असेट अलोकेशन करते रहे। हर निवेश पोर्टफोलियो को बदलते हालात के साथ बदलते रहना जरूरी है। इसलिए इस बात को दरकिनार करना ज्यादा ठीक है कि किस फंड के बारे में कौन-सी रेटिंग एजेंसी क्या कह रही है। जो भी इन्वेस्टमेंट किया जा रहा है, वह आपकी जरूरत के अनुसार किया जाना चाहिए। हालांकि, निवेशक ऐसा कर नहीं पाते हैं। 

अधिकतर निवेशक यही करते हैं कि वे किसी और फंड की तुलना अपने द्वारा किए गए निवेशित फंड से करते हैं। वे यह नहीं मानते हैं कि इस तरह के तुलनात्मक अध्ययन गलत जानकारियां और तथ्य लिए होते हैं। यह पूरी तरह से जानकारी नहीं देते हैं। क्योंकि हर स्कीम के अपने मकसद होते हैं और अपने बेंचमार्क, जिनके आधार पर रिटर्न मिलता है। बीएसई और एनएसई ने बाजार के बेंचमार्क तय कर रखे हैं। इसमें विभिन्न बाजार पूंजीकरण, सेगमेंट व सेक्टर वाले शेयर रहते हैं। साथ ही इनमें विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों के अलग-अलग सूचकांक भी मौजूद है। ये बेंचमार्क ही म्युचुअल फंड स्कीमों को देख रहे फंड मैनेजरों के लिए अहम होते हैं। 

म्युचुअल फंड्स में निवेश की रणनीति इक्विटी, डेब्ट और सोने में निवेश को संतुलित करने के लिए हैं। कुछ स्कीमों में एक ही सेक्टर के पोर्टफोलियो होते हैं, जबकि कुछ में विविध क्षेत्रों के पोर्टफोलियो होते हैं। 

वेबसाइट पर आप देख सकते हैं कि हर वर्ष टॉप परफॉर्मेंस देने वाले फंड्स की सूची में नया नाम सामने आ जाता है। पुराना हट जाता है। भले ही आप किसी भी स्तर पर रिसर्च करने के बाद निवेश करें, लेकिन शीर्ष 5 या शीर्ष 10 म्युचुअल फंड्स के क्रम हमेशा बदल जाते हैं। 
 
फैक्ट:  मार्च 2010 में नेशनल पेंशन स्कीम (एनपीएस)  का असेट अंडर मैनेजमेंट 4679 करोड़ रु. था, जो दिसंबर तक 2016 1.6 लाख करोड़ रु. पहुंच गया।
 
सुरेश नरूला
सदस्य, फाइनेंशियल प्लानर्स गिल्ड ऑफ इंडिया
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