पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

परहित का जीवन ही धर्म है

8 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
धार्मिक व्यक्ति सबकी पसंद होता है। जो आपके वश में है, जिसे आप ही कर सकते हैं इसे ही धार्मिक अनुष्ठान कहते हैं। कोई मुझे बुरा न समझे यह हमारे वश की बात नहीं है; लेकिन हम किसी को बुरा न समझें यह तो हमारे वश में है। इसी जीवन शैली से तन, मन, वचन, धन, योग्यता, शिक्षा, प्रतिष्ठा, अधिकार और पद से दूसरों का भला किया जाता है। परहित का जीवन ही धर्म है।
इस संदेश को सभी संतों ने अपने-अपने ढंग से व्यक्त किया है। शंकराचार्य ने धर्म के स्वरूप को क्रिया की पवित्रता से जोड़कर इस विचार में नवप्राण भरे थे। जब-जब हमें धर्म के प्रति भ्रम हो, शंकराचार्य के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होंने इसके विशाल स्वरूप चारों दिशा में स्थापित कर समझाया था कि जो बात अपने प्रतिकूल हो, वह दूसरों के लिए मत करो। कोई हमारा नुकसान न करे ऐसा होना हमारे हाथ में नहीं है।
'
पर हम किसी का नुकसान न करें यह हमारे ही हाथ में है। धर्म इसी आत्मविश्वास को जगाता है। यह संदेश सारे संसार पर समान रूप से लागू होता है। आज हिंसा, अपराध, भोग के इस दौर में शंकराचार्य जैसे व्यक्ति से नई पीढ़ी को परिचित करवाना उनके उज्‍जवल भविष्य के लिए हितकारी होगा। इन दिनों धार्मिक अनुष्ठान बढ़ गए हैं, परंतु इसके पीछे श्रद्धा से ज्यादा प्रदर्शन है। इस परंपरा का वर्षो राजनेताओं, नौकरशाहों, कर्णधारों ने शोषण किया। आज के दौर में धर्मगुरु भी यही सीक्रेट अपनाने लगे। इसीलिए एक बार फिर शंकराचार्य की धर्म की परिभाषा समझी जाए।