कश्मीर में आतंकियों से अलगाव का दौर / कश्मीर में आतंकियों से अलगाव का दौर

दुर्लभ मौके का लाभ उठाकर राजनीतिक पक्षों से ही नहीं स्थानीय जनप्रतिनिधियों से भी चर्चा हो।

सैयद अता हसनैन

Sep 20, 2017, 06:53 AM IST
सैयद अता हसनैन। सैयद अता हसनैन।
पिछले दिनों गृहमंत्री राजनाथ सिंह जम्मू-कश्मीर में थे। 2016 के मध्य में वे कई बार वहां गए थे उसके बाद करीब सालभर बाद यह यात्रा हुई है। तब हिंसा ने खतरनाक गंभीर रूप ले लिया था और लोग फिर एक बार भारत से अलगाव का प्रदर्शन कर रहे थे। तब राजनाथ सिंह की शांत मुद्रा, राहत देने वाली भाषा के प्रयोग और जोर से बोलने की बजाय सुनने की तैयारी दिखाने से उथल-पुथल भरे दौर में स्थिति को गंभीरता व समझदारी से देखने का दृष्टिकोण पैदा हुआ था। उनके मिशन से चाहे तत्काल शांति स्थापित न हुई हो लेकिन, उन्होंने खुला दिमाग रखकर आगे बढ़ने की तैयारी दिखाई। देश के अन्य हिस्सों में बढ़ती आलोचना के बीच भी लोगों तक पहुंचने की कोशिश की और उत्तेजना के माहौल में आपा न खोने की क्षमता ने लचीलेपन के पर्याप्त सबूत दिए। जबकि मुख्यमंत्री जरूर मीडिया के प्रश्नों के आगे धीरज खो बैठी थीं।

दोनों यात्राओं के बीच का वक्त उपद्रवी ही रहा है। मारे गए आतंकियों की संख्या लगभग उतनी ही थी, जितनी सैन्य शहीदों की। आतंकियों ने दुस्साहस के साथ पुलिस को, यहां तक कि एक युवा सैन्य अधिकारी तक को निशाना बनाया। आतंकी हमलों के दौर में जब स्थिति हाथ निकलती लग रही थी, तब से लेकर आज जकी नियंत्रित स्थिति तक वापसी काफी धीमी रही है। जब स्थिति बहुत नकारात्मक हो जाए तो शांति में निवेश के प्रयास छोड़कर नई रास्ते अपनाना श्रेष्ठ होता है। इसलिए देश से पैसा लेकर भी उसके धीरज की परीक्षा लेने वालों से बातचीत करने की विभिन्न शांति समूहों की सारी अपीलें खारिज कर दी गईं। इसके साथ सुरक्षा बलों को पहले जैसा प्रभुत्व कायम करने की छुट दी गई। सरकार पर जो दबाव पड़ रहा था, उसके आगे झुकना बहुत ही खराब रणनीति साबित होती। सुरक्षा बलों को अधिकार देने में राजनाथ सिंह का प्रमुख योगदान रहा, जबकि सेना उनके अधीन नहीं है। यह सबको मालूम है कि वे लंबे समय से सलाह-मसलत में लगे हुए हैं। उन्होंने नई पहल करने में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी है।

जम्मू-कश्मीर में विभिन्न पक्षों से चर्चा में गृह मंत्री ने ऊपर से नीचे की ओर संवाद साधने का जो तरीका अपनाया वह प्रधानमंत्री मोदी के भाषण के अनुरूप ही था, जिसमें उन्होंने सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों के स्तर पर प्रभुत्व हासिल करने की बजाय संवाद पर भी जोर दिया था। शायद इस पर सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की बैठक में चर्चा हुई हो। नई रणनीति में इसी मंशा को व्यवहार में लाना और ताजा प्रयोगों से इसे आकार देने की बात है। यदि इस विचार को सुरक्षा बलों की सोच में लाना है तो इसे किसी सिद्धांत के रूप में विकसित करना भी उतना ही जरूरी होगा।

बेशक सुरक्षा बलों के हावी रहने से जनता और अन्य पक्षों की सोच बदल जाती है। विशाल सुरक्षा नेटवर्क से पार पाने की चुनौती एक बार फिर लोगों के जेहन पर छा जाती है और आज़ादी का ख्याल पृष्ठभूमि में चला जाता है। लेकिन, यह भी सच है कि सुरक्षा बलों का जरूरत से ज्यादा हावी होना उलट नतीजे देता है। एक बार बलों की जरूरत से ज्यादा सक्रियता काम करने लगती है तो वह फिर गरिमा व आत्म-प्रतिष्ठा के खिलाफ काम करने लगती है। जिनके दिमाग में लंबी अवधि के लक्ष्य नहीं होते उनसे प्रेरित होना आसान है लेकिन, हम अभी ऐसी अवस्था तक नहीं पहुंचे हैं कि जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों को सक्रिय अभियानों से हटा सकें। असली परीक्षा तो आने वाली शीत ऋतु में होगी, जब हिंसा का स्तर और आतंकियों की संख्या यह संकेत देगी कि घुसपैठ या आतंकियों की भर्ती (या दोनों) के खिलाफ सुरक्षा बलों की कार्रवाई कितनी असरदार रही। अब यह जाहिर होने में ज्यादा वक्त नहीं है।

मेरा जमीनी फीडबैक तो यही है कि हम उस दुर्लभ दौर में है जब लोगों में विरोध की क्षमता न्यूनतम स्तर पर है। हो सकता है कि उनमें भारत और भारतीयों के बारे में सकारात्मक भावना न हो पर हिंसा, पाकिस्तान, आतंकी और पृथकतावादी नेताओं के प्रति अलगाव काफी है। लंबे समय से चल रहे छद‌्म युद्ध में ऐसे क्षण दुर्लभ ही रहे हैं। इसका लाभ नहीं उठाया गया तो यह स्थिति की मांग को समझने में हमारी नाकामी होगी। लेकिन, इस पल को पकड़ने की प्रक्रिया में लोगों के लिए और हताशा नहीं बल्कि उम्मीद होनी चाहिए। इस दिशा में प्रधानमंत्री के शब्दों के आने में एक क्षण की भी देरी नहीं हुई है और गृहमंत्री आगे के रास्ते की पड़ताल कर रहे हैं। मुख्यमंत्री और उनके डेप्यूटी पर दिल्ली का मार्गदर्शन करने की बहुत बड़ी भूमिका है। उपमुख्यमंत्री को जम्मू को भी चर्चा की प्रक्रिया में लाना चाहिए।
गृहमंत्री ने आश्वस्त किया है कि प्रधानमंत्री के भाषण के बाद जो रणनीति अपनाई गई है उसके लिए वे वक्त, ऊर्जा और फोकस देंगे। बेहतर होता कि उन्हें राज्य के भीतरी भागों में नहीं बल्कि उड़ी, गुरेज या तंगधर के बाहरी हिस्सों में एक-दो सार्वजनिक सभाएं करने की सलाह दी जाती। यह भारत को समर्थन देने वालों के प्रति आभार जताने की मुद्रा होती और भीतरी भागों में सरकार की पहल का इंतजार करने वालों को इशारा होता। इससे उस इलाके में राजनीतिक गतिविधि की शुरुआत होती, जहां मौजूदा परिस्थितियों के कारण लोगों की आवाज उनके प्रतिनिधियों तक नहीं पहुंचती।

यह गृहमंत्री के लिए सिर्फ श्रीनगर व जम्मू में संबंधित पक्षों से मिलने से बेहतर होता। उनकी मौजूदगी वह चीज ला सकती है, जो अन्यों के बस में नहीं है। उनके लिए यह जरूरी है कि वे जम्मू स्थित प्रतिनिधियों को श्रीनगर बुलाकर कश्मीर के नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के साथ भविष्य पर चर्चा करें। यही प्रक्रिया जम्मू में विस्तार के साथ दोहराई जा सकती है। दोनों जगहों पर लद्‌दाख के कुछ लोगों को भी शामिल करना सोने में सुहागा होगा। लंबे समय से मेरा विचार रहा है कि कश्मीर के सामाजिक और आर्थिक लैंडस्कैप को शांत करने की कुंजी जम्मू के पास है। शांति स्थापित होने से जम्मू-कश्मीर के राष्ट्रवादी और जिम्मेदार नेताओं को अागे लाने में मदद मिलेगी। इससे कश्मीरी मीडिया को पृथकतावादियों के भय का कफन दूर फेंकने में भी मदद मिलेगी, जिसके साए में फिलहाल वह काम कर रहा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
सैयद अता हसनैन
लेफ्टि. जन (रिटायर्ड), कश्मीर में सेना की 15वीं कोर के पूर्व कमांडर
atahasnain@gmail.com
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