जाति पंचायतों के खिलाफ महाराष्ट्र की प्रेरक पहल

4 वर्ष पहले
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जातिगत और सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ कानून बनाने वाला महाराष्ट्र पहला राज्य बन गया है। इसके तहत दोषियों को तीन साल तक की सजा और एक लाख रुपए जुर्माने का प्रावधान है। जातीय भेदभाव, जाति पंचायत, धार्मिक, स्कूल व मेडिकल सुविधाएं रोकने जैसा व्यवहार नए कानून में अपराध है।

गौरतलब है कि जाति, धर्म, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव रोकने के लिए पहले ही कई संवैधानिक और सांविधिक आयोग तथा कानून भी बनाए जा चुके हैं। अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग  (1990), राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (1993), राष्ट्रीय महिला आयोग (1992), राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग  (2007) आदि जातिगत और सामाजिक बहिष्कार रोकने में सक्षम हैं लेकिन, स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ। चाहे हाल ही में सहारनपुर में दलितों पर हुए अत्याचार हों या देश में मल ढोने की कुप्रथा के समाचार। यह राष्ट्रीय शर्मिंदगी का कारण तो है ही, सामाजिक समरसता के लिए भी गंभीर खतरा है। अगर मैला ढोने की प्रथा की बात करें तो 2011 की जनगणना के मुताबिक देशभर में तब 13 लाख लोग इस काम को कर रहे थे। 1993 में ही नरसिंह राव सरकार ने इसे खत्म करने के लिए कानून बनाया था लेकिन, किसी भी राज्य ने इसे सख्ती से लागू नहीं किया। ऊपर से इस काम को करने के लिए बेबस लोगों का समाज में पूरी तरह बहिष्कार किया जाता है। लोग इन्हें अपने पास फटकने भी नहीं देते। ऐसे में हमारी संस्कृति का विकास कैसे संभव है। हम सभ्य समाज का निर्माण कैसे कर पाएंगे? 
एक ऐसे समय में जब हमारी विकास दर सबसे तेज है और हम महाशक्ति बनने की चाह रखते हैं, इस प्रकार की दकियानूसी सोच के निवारण के लिए एक सार्थक पहल की जरूरत है। जिस प्रकार महाराष्ट्र सरकार ने एक नज़ीर पेश की है, उससे अन्य राज्यों को सीखने की जरूरत है। इसके अलावा वंचित और शोषित समुदायों के अधिकारों की बेहतर गारंटी के लिए सरकार को सामाजिक एवं रोजगार सुरक्षा, आवास, वित्तीय सहायता आदि मुहैया करानी चाहिए ताकि समाज में ये लोग सशक्त हों और किसी भी घृणित कार्यों का बहिष्कार कर सकें।
 
करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच 
रिजवान अंसारी, 25 
जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली 
www.facebook.com/riz.ansari91 
 
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