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आचार्य ने जड़मति शिष्य से मानी हार

9 वर्ष पहले
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वाराणसी में आचार्य बोधिसत्व के आश्रम में अनेक शिष्य थे। इन्हीं में से एक अत्यंत मूर्ख था। एक दिन आचार्य विचार करने लगे - ‘यह मेरी बहुत सेवा करता है, किंतु कम अक्ल होने से विद्या अर्जित नहीं कर पाता। यदि मैं नित्य इसे लकड़ी व फल-फूल लेने जंगल और गांव में भिक्षा मांगने भेजूं और लौटने पर इससे पूछूं कि आज तूने क्या-क्या देखा? तब मुझे शायद यह नई-नई उपमा देकर समझाएगा और हो सकता है कि यह भी ज्ञानी बन जाए।’
अगले दिन उन्होंने उससे कहा- ‘आज से तुम जंगल में जाओ और वहां जो देखो मुझे बताओ।’ शिष्य ने जंगल में सांप देखा। लौटने पर आचार्य ने पूछा- ‘सांप कैसा होता है?’ वह बोला- ‘हल की फाल जैसा।’ आचार्य ने सोचा कि इसने उपमा ठीकदी है, क्योंकिसांप हल की फाल के तरह ही होता है। अगले दिन उसने हाथी देखा। आचार्य ने पूछा - ‘हाथी कैसा होता है?’ उसने वही जवाब दोहराया- ‘हल की फाल जैसा।’
हाथी की सूंड हल की फाल जैसी होती है, इसलिए यह ऐसा कह रहा है और आचार्य अपने शिष्य के बुद्धिमान बनने के प्रति आशावान बने रहे। एक दिन उसने कहा- ‘गुरुजी! आज हमने गांव में दही-दूध के साथ गुड़ खाया। वह हल की फाल की तरह होता है। सुनते ही आचार्य सोच में पड़ गए- ‘सांप, हाथी को तो हल की फाल जैसा मान सकते हैं, किंतु दूध-दही को बिल्कुल नहीं। यहां तो यह उपमा बिल्कुल गलत है। इस मूर्ख को मैं तो क्या, दुनिया का कोई भी आचार्य बुद्धिमान नहीं बना सकता।’ आचार्य ने उसी दिन उस शिष्य को आश्रम से विदा कर दिया। वस्तुत: कुछ लोग मतिहीन होते हैं और ऐसे लोगों पर समय व्यर्थ करने से बेहतर इनसे मुक्ति ले लेना ही होता है।